KNEWS DESK – भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित महान गायक, संगीतकार और फिल्मकार भूपेन हजारिका की आज जन्म शताब्दी है। असम की धरती से निकलकर अपनी आवाज और संगीत के जरिए देश-दुनिया में पहचान बनाने वाले भूपेन हजारिका को उनकी जन्मशती पर याद किया जा रहा है। हालांकि, जिस स्तर की सांस्कृतिक शख्सियत वह थे, उस हिसाब से उनकी जन्मशती को लेकर उतनी चर्चा नजर नहीं आती।
भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम के तिनसुकिया में हुआ था। वह सिर्फ गायक नहीं थे, बल्कि संगीतकार, गीतकार, फिल्म निर्देशक, लेखक और निर्माता भी थे। उनकी रचनाओं में असम की मिट्टी, आम आदमी का संघर्ष, सामाजिक सरोकार और आध्यात्मिक चेतना एक साथ दिखाई देती है।
असम की आवाज को दिलाई राष्ट्रीय पहचान
भूपेन हजारिका ने असमिया संस्कृति और संगीत को देशभर में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी आवाज में मिट्टी की खुशबू और लोकजीवन की गहरी छाप सुनाई देती थी। उन्होंने असमिया के साथ-साथ हिंदी और बांग्ला में भी गीत गाए और अपने संगीत को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाया।
उनके गीतों में सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि समाज के सवाल भी थे। गरीब और कमजोर तबके की पीड़ा से लेकर इंसानियत, आध्यात्मिकता और बदलाव की आवाज तक, उनकी रचनाओं में सब कुछ देखने को मिलता है।
‘दिल हूम हूम करे’ ने बनाया अलग मुकाम
भूपेन हजारिका और फिल्ममेकर कल्पना लाजमी की जोड़ी हिंदी सिनेमा में भी बेहद चर्चित रही। 1993 में आई फिल्म ‘रुदाली’ इसका बड़ा उदाहरण है। डिंपल कपाड़िया, राज बब्बर, राखी और अमजद खान जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म का संगीत भूपेन हजारिका ने दिया था।
फिल्म का गीत ‘दिल हूम हूम करे’ आज भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इसे लता मंगेशकर और भूपेन हजारिका ने अपनी-अपनी आवाज में गाया था। लता की आवाज में जहां गीत को अलग विस्तार मिला, वहीं भूपेन हजारिका की आवाज में इसमें लोक संस्कृति और मिट्टी की गहराई महसूस होती है।
‘गंगा बहती हो क्यों’ में उठाया बड़ा सवाल
भूपेन हजारिका के गीतों की खासियत थी कि वह सीधे समाज से सवाल करते थे। ‘गंगा बहती हो क्यों’ ऐसा ही एक गीत है, जिसमें उन्होंने आस्था के साथ सामाजिक असमानता और कमजोर तबके की स्थिति पर सवाल उठाया।
उनकी रचनाओं में यह सवाल बार-बार दिखाई देता है कि अगर गंगा सबको मुक्ति देती है, तो फिर समाज के कमजोर और वंचित लोगों को ताकत क्यों नहीं देती।
यही वजह है कि भूपेन हजारिका का संगीत सिर्फ सुनाई नहीं देता, बल्कि सोचने के लिए मजबूर भी करता है।
एक नहीं, कई विधाओं में माहिर थे
भूपेन हजारिका की प्रतिभा सिर्फ गायकी तक सीमित नहीं थी। उन्होंने फिल्मों का निर्देशन किया, संगीत दिया, गीत लिखे, पटकथाएं लिखीं और फिल्मों के निर्माण से भी जुड़े।
उन्होंने असमिया फिल्मों के साथ हिंदी और बांग्ला सिनेमा में भी काम किया। लता मंगेशकर, आशा भोसले, हेमंत कुमार और बलराज साहनी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ उनका जुड़ाव रहा।
कल्पना लाजमी के साथ उनकी लंबी रचनात्मक साझेदारी रही। ‘एक पल’, ‘रुदाली’, ‘दरमियां’ और ‘दमन’ जैसी फिल्मों में दोनों ने साथ काम किया।
संगीत के क्षेत्र में भारत रत्न पाने वाले चुनिंदा कलाकार
भूपेन हजारिका को मरणोपरांत 2019 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। संगीत के क्षेत्र में उनसे पहले एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, पंडित रविशंकर, लता मंगेशकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और पंडित भीमसेन जोशी जैसी महान हस्तियों को भारत रत्न मिल चुका था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारतीय संगीत और संस्कृति में भूपेन हजारिका का योगदान कितना बड़ा था।
भूपेन हजारिका का निधन 5 नवंबर 2011 को हुआ था, लेकिन उनकी आवाज आज भी उनके गीतों में जिंदा है। ‘दिल हूम हूम करे’ हो या ‘गंगा बहती हो क्यों’, उनके गीत आज भी नई पीढ़ी को अपनी ओर खींचते हैं।
उनकी जन्मशती सिर्फ एक महान कलाकार को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उस संगीत और विचारधारा को फिर से समझने का मौका है, जिसमें लोक संस्कृति, इंसानियत और सामाजिक बदलाव की आवाज एक साथ सुनाई देती है।