लखनऊ के जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र को 30 साल के लिए निजी समूह को लीज पर देने के फैसले ने यूपी की सियासत गरमा दी है. अखिलेश यादव ने इसे सार्वजनिक संपत्ति के निजीकरण की दिशा में कदम बताया, जबकि बीजेपी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संपत्ति बेची नहीं जा रही है.
Knews Desk– लखनऊ के जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र (JPNIC) को लेकर उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सियासी घमासान शुरू हो गया है. राज्य सरकार की ओर से लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बीजेपी सरकार पर निशाना साधा. अखिलेश ने आरोप लगाया कि सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने की दिशा में आगे बढ़ रही है. इसके जवाब में बीजेपी ने सपा सरकार के कार्यकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार और परियोजना की लागत को लेकर पलटवार किया है.
अखिलेश यादव ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि बीजेपी सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को निजी क्षेत्र को सौंपने का काम कर रही है. उन्होंने तंज कसते हुए सरकार को ‘दुकानदार’ तक कह दिया और आरोप लगाया कि निजीकरण को सरकार अपनी नीतियों का हिस्सा बना रही है. उनका कहना है कि जिस परियोजना को जनता के लिए विकसित किया गया, उसे निजी हाथों में देना उचित नहीं है.
बीजेपी ने अखिलेश यादव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि JPNIC को बेचा नहीं जा रहा है. बीजेपी नेताओं के मुताबिक, केंद्र का स्वामित्व और अधिकार LDA के पास ही रहेगा. बीजेपी प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने सपा सरकार के दौरान भ्रष्टाचार और परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए कहा कि अखिलेश यादव बीजेपी सरकार के विकास कार्यों को स्वीकार नहीं करना चाहते.
बीजेपी के मुताबिक, JPNIC के निर्माण पर 800 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं, इसके बावजूद यह अब तक पूरी तरह से कार्यात्मक नहीं हो पाया है. पार्टी का तर्क है कि सरकार का उद्देश्य इस बड़े परिसर को लंबे समय तक निष्क्रिय रखने के बजाय बेहतर तरीके से विकसित और संचालित करना है.
दरअसल, JPNIC का निर्माण समाजवादी पार्टी सरकार के दौर में शुरू हुआ था. परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 265 करोड़ रुपये बताई गई थी, लेकिन समय के साथ इसकी लागत बढ़कर 800 करोड़ रुपये से अधिक हो गई. यही वजह है कि यह परियोजना लंबे समय से राजनीतिक बहस का मुद्दा बनी हुई है.
अब सरकार ने इसे निजी समूह को 30 साल के लिए संचालन और रखरखाव के उद्देश्य से लीज पर देने का फैसला किया है. राज्य मंत्रिमंडल ने LDA के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. प्रस्ताव के अनुसार, चयनित निजी समूह को LDA को 831 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा.
सरकार और LDA अधिकारियों का कहना है कि यह सौदा संपत्ति की बिक्री नहीं है. जमीन और परिसर का मालिकाना हक LDA के पास ही रहेगा. निजी समूह को केवल तय शर्तों के तहत JPNIC के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी दी जाएगी. इसके जरिए परिसर को सम्मेलनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेल गतिविधियों के लिए विकसित करने की योजना है.
वहीं, समाजवादी पार्टी इस फैसले को निजीकरण के नजरिए से देख रही है. अखिलेश यादव का आरोप है कि बीजेपी सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को धीरे-धीरे निजी हाथों में सौंप रही है. दूसरी ओर बीजेपी का कहना है कि लीज पर देने का उद्देश्य बंद पड़े या अपेक्षित तरीके से इस्तेमाल न हो रहे परिसर को बेहतर बनाना और उससे सार्वजनिक उपयोग बढ़ाना है.
यानी JPNIC विवाद का केंद्र सिर्फ लीज का फैसला नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि सार्वजनिक संपत्ति को निजी समूह के संचालन में देना निजीकरण माना जाए या लंबे समय से निष्क्रिय परियोजना को बेहतर तरीके से चलाने का प्रयास. फिलहाल इस मुद्दे पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी आमने-सामने हैं और आने वाले दिनों में यह विवाद यूपी की सियासत में और तूल पकड़ सकता है.