KNEWS DESK- दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को लाल किला ब्लास्ट केस के आरोपी जसीर बिलाल वानी उर्फ दानिश की डिफॉल्ट बेल याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की पीठ ने वानी की उस याचिका को मंजूर नहीं किया, जिसमें उसने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच के लिए 90 दिनों से अधिक की अवधि बढ़ाए जाने को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल वानी को डिफॉल्ट बेल पर रिहाई नहीं मिलेगी।
मामला 2025 में दिल्ली के लाल किला इलाके में हुए विस्फोट से जुड़ा है। जसीर बिलाल वानी को NIA ने नवंबर 2025 में गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी के मुताबिक, वानी इस मामले में कथित तौर पर सक्रिय सह-षड्यंत्रकारी था और उसने हमले की साजिश में तकनीकी सहायता मुहैया कराई थी। NIA ने आरोप लगाया है कि उसने ड्रोन में बदलाव करने और रॉकेट तैयार करने जैसी गतिविधियों में तकनीकी मदद दी थी। एजेंसी के अनुसार, वह मामले के मुख्य आरोपी उमर उन नबी के संपर्क में भी था।
वानी की डिफॉल्ट बेल याचिका का मुख्य आधार जांच की निर्धारित समय सीमा थी। उसके वकील की ओर से दलील दी गई कि 90 दिनों की अवधि पूरी होने के बाद भी अगर जांच एजेंसी चार्जशीट दाखिल नहीं करती है, तो आरोपी को कानून के तहत डिफॉल्ट बेल का अधिकार मिल सकता है। वकील ने यह भी तर्क दिया कि NIA ने जांच की अवधि बढ़ाने के लिए 13 फरवरी को आवेदन किया था, जबकि 90 दिनों की अवधि 15 फरवरी को समाप्त होनी थी। इसलिए जांच अवधि बढ़ाने का आदेश कानूनी रूप से सही नहीं था।
इस मामले में UAPA यानी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की विशेष व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। सामान्य परिस्थितियों में गंभीर अपराधों की जांच के लिए निर्धारित अवधि पूरी होने पर आरोपी डिफॉल्ट बेल का दावा कर सकता है। हालांकि, UAPA के तहत जांच की अवधि कुछ शर्तों के अधीन 90 दिनों से बढ़ाकर 180 दिनों तक की जा सकती है। अदालत को जांच की प्रगति और आरोपी को हिरासत में रखने के कारणों से संबंधित रिपोर्ट पर विचार करना होता है।
इसी प्रावधान के तहत विशेष NIA अदालत ने जांच की अवधि बढ़ाने की अनुमति दी थी। इसके बाद वानी की डिफॉल्ट बेल याचिका ट्रायल कोर्ट ने भी खारिज कर दी थी। वानी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले और जांच की अवधि बढ़ाने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसकी ओर से कहा गया कि अगर जांच अवधि बढ़ाने का आदेश ही वैध नहीं है, तो डिफॉल्ट बेल से इनकार करने का फैसला भी कायम नहीं रह सकता।
दूसरी ओर, NIA ने वानी की दलीलों का विरोध किया। एजेंसी की ओर से पेश स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर माधव खुराना ने कहा कि विशेष NIA अदालत के दोनों आदेशों में कोई कानूनी खामी नहीं है। जांच एजेंसी ने अदालत के सामने यह पक्ष रखा कि मामले की जांच जारी रखने के लिए अतिरिक्त समय देने का आदेश कानून के अनुरूप था। इसी आधार पर NIA ने हाईकोर्ट से वानी की याचिका खारिज करने का आग्रह किया।
NIA ने मई 2026 में इस मामले में चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद भी जांच और अदालत में चल रही कानूनी प्रक्रिया से जुड़े कई पहलू सामने आए हैं। वानी समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ एजेंसी ने गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों का अदालत में अंतिम रूप से साबित होना अभी बाकी है। डिफॉल्ट बेल याचिका खारिज होने का अर्थ भी यह नहीं है कि आरोपी को मामले में दोषी ठहरा दिया गया है। यह फैसला मुख्य रूप से जांच की समय सीमा और डिफॉल्ट बेल के कानूनी अधिकार से जुड़ा है।
डिफॉल्ट बेल और नियमित जमानत के बीच भी अंतर होता है। डिफॉल्ट बेल मुख्य रूप से जांच एजेंसी द्वारा निर्धारित समय के भीतर जांच पूरी करने और आवश्यक रिपोर्ट दाखिल करने से जुड़े प्रावधानों पर निर्भर करती है। वहीं नियमित जमानत में अदालत मामले के आरोपों, उपलब्ध सामग्री और संबंधित कानूनों के तहत जमानत देने की परिस्थितियों पर विचार करती है। UAPA मामलों में नियमित जमानत के लिए कानूनी कसौटी काफी सख्त है।
दिल्ली हाईकोर्ट के मंगलवार के फैसले के बाद जसीर बिलाल वानी को डिफॉल्ट बेल के आधार पर तत्काल राहत नहीं मिली है। मामले में NIA की जांच और न्यायिक प्रक्रिया आगे जारी रहेगी। अदालत के फैसले से यह स्पष्ट है कि केवल 90 दिन बीत जाने के आधार पर UAPA के तहत आरोपी को स्वतः डिफॉल्ट बेल का अधिकार नहीं मिल जाता, यदि जांच अवधि कानून के तहत वैध रूप से बढ़ाई गई हो।