उज्जैन के प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व विशेष तरीके से मनाया जाता है. करीब 200 साल पुरानी परंपरा के तहत जन्माष्टमी के बाद भगवान कृष्ण को बाल स्वरूप में माना जाता है और बछ बारस तक उनकी शयन आरती नहीं की जाती.
Knews desk- धार्मिक नगरी उज्जैन में जन्माष्टमी को लेकर भक्तों में खास उत्साह देखने को मिल रहा है. शहर के प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन किए जा रहे हैं. मंदिर में करीब दो शताब्दियों से एक अनोखी परंपरा चली आ रही है, जिसके तहत जन्माष्टमी के बाद भगवान श्रीकृष्ण को बाल स्वरूप में माना जाता है.
मंदिर के पुजारी पंडित पावन शर्मा के अनुसार, गर्भगृह में स्थापित भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा युवा स्वरूप में है, लेकिन जन्माष्टमी की आधी रात जन्मोत्सव के बाद उन्हें नवजात बालक माना जाता है. मान्यता है कि छोटे बच्चे के सोने-जागने का कोई निश्चित समय नहीं होता. इसी भाव के चलते जन्माष्टमी के बाद बछ बारस तक भगवान की शयन आरती नहीं की जाती.
यह विशेष परंपरा जन्माष्टमी से लेकर बछ बारस तक जारी रहती है. बछ बारस के दिन मंदिर में मटकी फोड़ने का आयोजन किया जाता है. इसके बाद भगवान की शयन आरती दोबारा शुरू कर दी जाती है. इस अवधि में भगवान को बाल कृष्ण के रूप में मानकर विशेष पूजा और सेवा की जाती है.
1100 किलो पेड़े का लगाया गया महाभोग
जन्माष्टमी के मौके पर मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण को 1100 किलो पेड़े का महाभोग अर्पित किया गया. सुबह विशेष पूजन के साथ राजभोग आरती हुई. इसके बाद दोपहर में भगवान को पेड़ों का विशाल भोग लगाया गया. शाम को संध्या आरती और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होंगे.
रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा. जन्म आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन खोले जाएंगे. भक्त देर रात तक भगवान के दर्शन कर सकेंगे.
श्रीकृष्ण की शिक्षा से भी जुड़ा है उज्जैन
उज्जैन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच धार्मिक रूप से गहरा संबंध माना जाता है. मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने अपने भाई बलराम के साथ गुरु सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी. कहा जाता है कि उन्होंने यहां 64 दिनों में वेद, शास्त्र, पुराण और 64 कलाओं सहित विभिन्न विद्याओं का ज्ञान हासिल किया.
इसी वजह से जन्माष्टमी के दौरान उज्जैन के कृष्ण मंदिरों में विशेष धार्मिक आयोजन देखने को मिलते हैं.
बायजाबाई शिंदे ने करवाया था मंदिर का निर्माण
द्वारकाधीश गोपाल मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में महाराजा दौलतराव सिंधिया की पत्नी बायजाबाई शिंदे ने करवाया था. मंदिर की स्थापत्य कला में मराठा शैली की झलक दिखाई देती है.
मंदिर के गर्भगृह में भगवान गोपाल जी और श्रीकृष्ण के साथ शिव-पार्वती, बायजाबाई शिंदे, हनुमान जी, गाय और गरुड़ जी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं. संगमरमर और चांदी से बनी प्रतिमाएं मंदिर की भव्यता को और बढ़ाती हैं.
उज्जैन के इस मंदिर में जन्माष्टमी के बाद भगवान को बाल स्वरूप मानने और कई दिनों तक शयन आरती नहीं करने की परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है.