Knews Desk- पाकिस्तान द्वारा चीन की मदद से बंगाल की खाड़ी में आधुनिक ‘हैंगर-क्लास’ पनडुब्बियों की तैनाती की संभावित योजना ने दक्षिण एशिया में समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कदम चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की घेराबंदी करना बताया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान चीन से प्राप्त तकनीक के आधार पर आठ ‘हैंगर-क्लास’ पनडुब्बियों का बेड़ा तैयार कर रहा है, जिनमें से एक को हाल ही में पाकिस्तानी नौसेना में शामिल किया गया है। यह पनडुब्बियां एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस हैं, जिससे इन्हें लंबे समय तक पानी के भीतर रहकर ऑपरेशन करने की क्षमता मिलती है और इनका पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है।
पाकिस्तानी नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान के बाद यह मामला और अधिक सुर्खियों में आया, जिसमें उन्होंने बंगाल की खाड़ी जैसे दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में भी उपस्थिति दर्ज कराने की बात कही थी। इस बयान के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियां और नौसेना सतर्क हो गई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का यह कदम 1971 के युद्ध के बाद पहली बार बंगाल की खाड़ी में सक्रिय होने की कोशिश माना जा रहा है। उस समय भारतीय नौसेना ने पाकिस्तानी पनडुब्बी PNS गाजी को विशाखापत्तनम के पास नष्ट कर दिया था, जिसके बाद पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक गतिविधियां सीमित कर दी थीं।
नई योजना के तहत पाकिस्तान अपनी समुद्री क्षमता को बढ़ाकर हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्य पाकिस्तान के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि बंगाल की खाड़ी तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी होगी और लॉजिस्टिक सपोर्ट की भी गंभीर समस्या होगी।
भारतीय नौसेना पहले से ही इस क्षेत्र में मजबूत स्थिति में है। भारत के पास P-8I पोसाइडन समुद्री निगरानी विमान, MH-60R रोमियो हेलीकॉप्टर और आधुनिक युद्धपोतों का बेड़ा मौजूद है, जो पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम हैं। इसके अलावा भारत की परमाणु पनडुब्बियां और पूर्वी नौसेना कमान की मजबूत उपस्थिति भी इस क्षेत्र को सुरक्षित बनाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह रणनीति चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी हुई है, लेकिन भारतीय नौसेना की निगरानी और तकनीकी क्षमता के सामने इस योजना की सफलता पर गंभीर सवाल बने हुए हैं।