कर्मचारियों ने सरकार से निजीकरण रोकने और बैंक का सार्वजनिक क्षेत्र का दर्जा बरकरार रखने की मांग की। मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन तेज करने की चेतावनी।
Knews Desk – चंडीगढ़, 2 नवंबर। IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में बैंक के अधिकारी और कर्मचारी दो दिवसीय देशव्यापी भूख हड़ताल पर हैं। सोमवार सुबह 10 बजे शुरू हुई यह भूख हड़ताल मंगलवार, 3 नवंबर शाम 6 बजे तक चलेगी। कर्मचारी संगठनों ने दावा किया है कि आंदोलन में देशभर के 20 हजार से अधिक कर्मचारी शामिल हैं। कर्मचारियों ने सरकार से निजीकरण की प्रक्रिया रोकने और बैंक का सार्वजनिक क्षेत्र का दर्जा बरकरार रखने की मांग की है।
बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के नेशनल प्रेसिडेंट सौरभ कुमार ने कहा कि IDBI बैंक में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की हिस्सेदारी है। अब बैंक की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी कंपनी को बेचने की तैयारी की जा रही है। कर्मचारियों का विरोध इसी प्रस्तावित फैसले को लेकर है।
सौरभ कुमार के मुताबिक, कर्मचारियों ने अपनी चिंताओं से सरकार को कई बार पत्र और ईमेल के जरिए अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला। बैंक मैनेजमेंट के साथ भी कई दौर की बातचीत हुई, मगर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया गया। ऐसे में कर्मचारियों को भूख हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंकिंग यूनियंस सहित विभिन्न बैंक कर्मचारी संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने भी आंदोलन को समर्थन दिया है। कई सांसदों ने भी निजीकरण के विरोध में पत्र लिखकर अपना समर्थन जताया है।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि IDBI बैंक पिछले छह वर्षों से लगातार मुनाफे में चल रहा है। सौरभ कुमार के अनुसार, बैंक ने पिछले वित्त वर्ष में 9,500 करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा दर्ज किया। कर्मचारियों का सवाल है कि जब बैंक अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, तो उसे निजी हाथों में सौंपने की जरूरत क्यों है।
कर्मचारियों का तर्क है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सरकारी और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लागू करने, छोटे कारोबारियों को कर्ज देने और विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनके मुताबिक, निजीकरण से आम लोगों, गरीब और मध्यम वर्ग के ग्राहकों के साथ-साथ बैंक कर्मचारियों के भविष्य पर भी असर पड़ सकता है। आरक्षित वर्ग और दिव्यांग कर्मचारियों के रोजगार के अवसरों तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी चिंता जताई गई है।
कर्मचारियों ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली, बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए। दूसरी, सरकार बैंक में अपनी हिस्सेदारी छह प्रतिशत बढ़ाए, ताकि बैंक का सार्वजनिक क्षेत्र का दर्जा बहाल किया जा सके। तीसरी, यदि निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता है, तो कर्मचारियों को किसी दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में स्थानांतरित होने का विकल्प दिया जाए।
यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंकिंग यूनियंस के प्रतिनिधियों ने भी निजीकरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य आम जनता, गरीबों, मजदूरों और मध्यम वर्ग तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना था। यूनियन प्रतिनिधियों के मुताबिक, IDBI बैंक पिछले पांच वर्षों में करीब 30 हजार करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा चुका है। ऐसे में सरकार को निजीकरण के फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए।
कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार की ओर से सकारात्मक पहल नहीं की गई, तो 3 नवंबर के बाद आंदोलन के अगले चरण की घोषणा की जाएगी। फिलहाल, बैंक के अधिकारी और कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर हैं और सरकार के रुख का इंतजार कर रहे हैं।