सुप्रीम कोर्ट ने SIR के दौरान तार्किक विसंगति की श्रेणी के इस्तेमाल और ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों को दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरने को कहे जाने पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR से जुड़े सभी मुद्दों पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
Knews Desk – सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची में नामों की जांच के लिए तार्किक विसंगति की श्रेणी के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अदालत ने इस प्रक्रिया की वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है। पश्चिम बंगाल में पहले दी गई अनुमति अंतरिम थी। बिहार SIR मामले में आए फैसले का यह मतलब नहीं है कि SIR से जुड़े सभी मुद्दों पर निर्णय हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में SIR के दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए करीब 43 लाख लोगों से दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरने को कहे जाने पर भी सवाल किया। अदालत ने पूछा कि जब फॉर्म-6 पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए है, तो पहले से मतदाता रहे लोगों को इसका इस्तेमाल क्यों करना पड़ रहा है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।
इस मामले में अदालत ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया और तार्किक विसंगति के आधार पर मतदाताओं की जांच को लेकर सवाल उठाए हैं। दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार में SIR के दौरान प्रभावित मतदाताओं और फॉर्म-6 के आवेदनों के आंकड़े भी सामने आए हैं।
पश्चिम बंगाल में तार्किक विसंगति के आधार पर करीब 27.16 लाख लोगों के नाम हटाने का आदेश दिया गया था। इस श्रेणी में नाम, उम्र, माता-पिता की उम्र और पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जुड़े अंतर के आधार पर जांच की गई। 17 सितंबर 2026 तक ट्रिब्यूनल ने कुल 1,26,194 अपीलों का निपटारा किया था। इनमें से 82,782 अपीलों के आंकड़ों के मुताबिक, 75,443 लोगों के नाम वोटर लिस्ट में दोबारा जोड़े गए, जबकि 7,339 नाम हटाए गए। ये आंकड़े सभी 27.16 लाख मामलों के नहीं, बल्कि अपीलीय ट्रिब्यूनल में पहुंचे मामलों के हैं।
दिल्ली में 19.34 लाख मतदाताओं को तार्किक विसंगति के नोटिस दिए गए। 28 अक्टूबर तक इनमें से 18.96 लाख मामलों का निपटारा कर उन्हें अंतिम वोटर लिस्ट में शामिल करने की मंजूरी दी गई। इसके मुताबिक, करीब 37,568 मामलों का निपटारा बाकी था। इसके अलावा, 13.80 लाख लोगों को 2002 की वोटर लिस्ट से अपना संबंध साबित नहीं कर पाने के कारण नोटिस मिले थे।
उत्तर प्रदेश में फरवरी 2026 में चुनाव अधिकारियों ने बताया था कि SIR के तहत 3.26 करोड़ मतदाताओं को नोटिस दिए गए। इनमें से 2.22 करोड़ नोटिस तार्किक विसंगति से जुड़े थे। इन मामलों में से कितने का निपटारा हुआ, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, 6 मार्च 2026 तक कुल 3.26 करोड़ नोटिस वाले मामलों में से करीब 2.80 करोड़ मामलों की सुनवाई पूरी हो चुकी थी। बिहार में भी SIR हुआ था, लेकिन वहां तार्किक विसंगति की श्रेणी शामिल नहीं थी।
फॉर्म-6 का इस्तेमाल वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है। चुनाव आयोग ने इसमें एक घोषणा-पत्र जोड़ा था, जिसके तहत आवेदक को खुद या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी का पिछली SIR से जुड़ा विवरण देना था। इस बदलाव पर चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फॉर्म-6 पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए है। पहले से मतदाता रहे और केवल घर बदलने वाले लोगों को फॉर्म-8 या दूसरी उचित प्रक्रिया का विकल्प मिलना चाहिए।
पश्चिम बंगाल में 17 दिसंबर 2025 से 7 अगस्त तक नाम जोड़ने के लिए आए 34.13 लाख फॉर्म-6 में से 7.26 लाख आवेदन खारिज किए गए। बिहार में 1 अगस्त 2025 को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होने के बाद 22.60 लाख फॉर्म-6 जमा हुए। इनमें से 21.5 लाख आवेदन स्वीकार किए गए, जबकि 1,06,304 आवेदन खारिज हुए।
उत्तर प्रदेश में 27 अक्टूबर 2025 से 6 मार्च 2026 तक वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 के कुल 86,69,073 आवेदन आए। वहीं, दिल्ली में 27 अक्टूबर 2026 तक फॉर्म-6 के कुल 2,71,639 आवेदन आ चुके हैं। हालांकि, दोनों राज्यों में कितने आवेदन खारिज हुए, इसकी जानकारी चुनाव आयोग की ओर से नहीं दी गई है।