चीन के साथ सीमा विवाद पर जनरल नरवणे की दोटूक, बोले- सैन्य टकराव के बजाय बातचीत से निकले रास्ता

भारत के पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने भारत-चीन सीमा विवाद पर कहा कि करीब 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा पर दोनों देशों की अलग-अलग धारणाओं के कारण टकराव की आशंका बनी रहती है। उन्होंने कहा कि गलवान संघर्ष ने चीन को संदेश दिया कि बल प्रयोग के जरिए एकतरफा सीमा बदलने की कोशिश भारत स्वीकार नहीं करेगा। नरवणे ने विवाद के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया।

Knews Desk – 23 अक्टूबर 2026 को पुणे में आईटी और बैंकिंग क्षेत्र के पेशेवरों की एक सभा को संबोधित करते हुए जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने कहा कि गलवान की घटना भारत-चीन सीमा पर हुए टकरावों में से एक थी। इसके बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि बल प्रयोग के जरिए सीमा को एकतरफा बदलने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी।

नरवणे के मुताबिक, गलवान संघर्ष के बाद भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और स्थिति को सैन्य, कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर मजबूती मिली। उन्होंने कहा कि बल प्रयोग पहला विकल्प नहीं, बल्कि आखिरी रास्ता होना चाहिए।

करीब 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा पर क्यों होता है टकराव?

पूर्व सेना प्रमुख ने भारत-चीन सीमा विवाद को समझाते हुए बॉर्डर और बाउंड्री के बीच अंतर का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय सीमा आम तौर पर स्पष्ट रूप से निर्धारित और मान्यता प्राप्त होती है, जबकि भारत और चीन के बीच सीमा का निर्धारण पूरी तरह स्पष्ट और दोनों देशों को समान रूप से स्वीकार नहीं है।

इसी वजह से कई इलाकों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को लेकर दोनों देशों की धारणाएं अलग-अलग हैं। नरवणे के मुताबिक, इतनी लंबी सीमा पर ऐसे क्षेत्र होना स्वाभाविक है, जहां दोनों पक्ष इस बात पर सहमत नहीं हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा कहां से गुजरती है। ऐसे इलाकों में सैनिकों के आमने-सामने आने और टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।

विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत से समाधान की उम्मीद

जनरल नरवणे ने भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत की व्यवस्था का भी जिक्र किया। भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन की ओर से विदेश मंत्री वांग यी इस प्रक्रिया में विशेष प्रतिनिधि हैं।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत पहले होती रही थी, लेकिन लंबे समय तक यह प्रक्रिया ठहर गई थी। अब इसे फिर से गति मिली है। नरवणे ने हालिया बातचीत में डिलिमिटेशन यानी सीमा के स्पष्ट निर्धारण से जुड़े मुद्दे का उल्लेख महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, सीमा विवाद के समाधान की दिशा में डिलिमिटेशन पहला कदम है।

ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र कर बताई भारत की रणनीति

पूर्व थलसेना प्रमुख ने ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस कार्रवाई के जरिए भारत ने संदेश दिया कि वह अपनी सुरक्षा से जुड़े मामलों में जरूरत पड़ने पर निर्णायक कदम उठा सकता है।

नरवणे के मुताबिक, भारत ने ऑपरेशन सिंदूर को इसलिए रोका, क्योंकि निर्धारित उद्देश्य हासिल कर लिए गए थे। उन्होंने कहा कि अभियान को आगे जारी रखना संभव था, लेकिन तब उसे कब रोकना है, यह फैसला पूरी तरह भारत के नियंत्रण में नहीं रहता।

अरुणाचल प्रदेश में सैनिकों के आमने-सामने आने का भी जिक्र

जनरल नरवणे का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अरुणाचल प्रदेश में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना होने की खबरें सामने आई हैं। ITBP के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने 22 अक्टूबर को राजस्थान के अलवर में ITBP कर्मियों के सम्मान समारोह के दौरान कहा था कि पिछले कुछ दिनों में अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिक आमने-सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति अब भी जारी है।

ITBP के महानिदेशक ने सीमा पर तैनात नवगठित शौर्य कमांडो बटालियन की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि इन कमांडो ने मौजूदा टकराव के दौरान प्रभावी भूमिका निभाई है। उनके मुताबिक, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में काम करने का अनुभव ITBP की प्रमुख ताकत है और इस क्षमता को आगे बढ़ाने की जरूरत है।

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