अमेरिका में इंफोसिस, TCS समेत 8 कंपनियों की PERM प्रक्रिया पर रोक लगाए जाने से भारतीय IT प्रोफेशनल्स के लिए स्थायी निवास हासिल करने की राह मुश्किल हो गई है। इसका असर H-1B वीजा पर काम करने वाले कर्मचारियों और उनके परिवारों की भविष्य की योजनाओं पर पड़ सकता है।
Knews Desk– अमेरिका में काम करने वाले भारतीय IT प्रोफेशनल्स के लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। अमेरिकी सरकार ने इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो, HCLTech, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी से जुड़ी PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। सरकार ने इन कंपनियों पर रोजगार और वीजा से संबंधित नियमों के दुरुपयोग के आरोप लगाए हैं। इस कदम से इन कंपनियों में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों की अमेरिका में स्थायी रूप से बसने की योजना प्रभावित हो सकती है।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इन आठ कंपनियों को 2009 से अब तक एक लाख से ज्यादा लेबर सर्टिफिकेशन मिल चुके हैं। ऐसे में इस फैसले को भारतीय तकनीकी पेशेवरों के लिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी इन कंपनियों के माध्यम से अमेरिका में काम करते हैं और लंबे समय से ग्रीन कार्ड मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
PERM प्रक्रिया क्या है और क्यों है जरूरी?
PERM अमेरिका में रोजगार के आधार पर ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण शुरुआती चरण है। इस प्रक्रिया में नियोक्ता कंपनी को अमेरिकी श्रम विभाग के सामने यह साबित करना होता है कि संबंधित पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा, विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और काम करने की परिस्थितियों पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
PERM प्रक्रिया पूरी होने के बाद कंपनी ग्रीन कार्ड के अगले चरणों की ओर बढ़ सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी श्रम विभाग ने प्रभावित आठ कंपनियों से संबंधित नए आवेदनों को स्वीकार नहीं करने और पहले से लंबित आवेदनों पर कार्रवाई रोकने का फैसला किया है। इससे उन कर्मचारियों की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिनके नियोक्ता उनके लिए स्थायी निवास का आवेदन आगे बढ़ा रहे हैं।
कंपनियों पर कार्रवाई की वजह क्या बताई गई?
अमेरिकी सरकार का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए वीजा और रोजगार संबंधी नियमों का गलत इस्तेमाल किया। सरकार का दावा है कि इस तरह की गतिविधियों से अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसरों और वेतन पर असर पड़ सकता है।
अधिकारियों के अनुसार, इन कंपनियों ने 2009 से अब तक करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए और उन्हें 2.30 लाख से ज्यादा H-1B वीजा मंजूर हुए। इसके अलावा, कंपनियों को एक लाख से अधिक परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन भी मिले हैं। हालांकि, इस कार्रवाई से प्रभावित होने वाले कर्मचारियों की सटीक संख्या और रोक की अवधि को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
H-1B वीजा पर काम करने वालों के लिए क्या बदलेगा?
PERM प्रक्रिया पर रोक लगने का मतलब यह नहीं है कि प्रभावित कंपनियों में काम करने वाले सभी कर्मचारियों के H-1B वीजा अपने आप रद्द हो जाएंगे। लेकिन जिन कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया इसी चरण पर निर्भर है, उनके लिए स्थायी निवास हासिल करने में देरी हो सकती है।
H-1B वीजा पर अमेरिका में काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों को लंबे समय तक अस्थायी वीजा पर निर्भर रहना पड़ सकता है। ऐसे कर्मचारियों के सामने वीजा की वैधता, नौकरी में बदलाव और भविष्य की योजनाओं को लेकर चुनौतियां बढ़ सकती हैं। यदि कोई कर्मचारी दूसरी कंपनी में नौकरी करता है, तो नई कंपनी के साथ ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत पड़ सकती है। वहीं, H-1B वीजा की सामान्य छह साल की सीमा पूरी होने पर अमेरिका में आगे रहने के विकल्प उसकी व्यक्तिगत आव्रजन स्थिति और लागू नियमों पर निर्भर करेंगे।
करीब 10 लाख भारतीय ग्रीन कार्ड के इंतजार में
नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी (NFAP) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में करीब 10 लाख भारतीय रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हैं। दिसंबर 2025 तक रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के कुल लंबित मामलों में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 79 प्रतिशत थी। देशवार सीमा के कारण भारतीय आवेदकों को लंबे बैकलॉग का सामना करना पड़ रहा है।
NFAP के अनुमान के मुताबिक, जनवरी 2026 में ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया शुरू करने वाले किसी कुशल भारतीय पेशेवर को अलग-अलग श्रेणियों में लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। अनुमानित समय इस प्रकार बताया गया है।
♦ EB-1 श्रेणी: 4 से 5 साल।
♦ EB-2 श्रेणी: 179 साल।
♦ EB-3 श्रेणी: 38 साल।
ये आंकड़े NFAP के अनुमान हैं, किसी आवेदक को ग्रीन कार्ड मिलने की निश्चित समय-सीमा नहीं। वास्तविक प्रतीक्षा अवधि वीजा उपलब्धता, कानूनों, प्राथमिकता तारीख और लंबित आवेदनों की संख्या के आधार पर बदल सकती है।
अमेरिकी विदेश विभाग के अक्टूबर 2026 के वीजा बुलेटिन के अनुसार, EB-2 श्रेणी में उन भारतीय आवेदकों की बारी आ सकती है, जिनकी प्राथमिकता तारीख 1 नवंबर 2013 से पहले की है। वहीं, EB-3 श्रेणी में 1 जनवरी 2014 से पहले आवेदन करने वाले कुछ आवेदक आगे बढ़ सकते हैं। रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की संख्या सीमित होने के कारण भारतीय आवेदकों को लंबा इंतजार करना पड़ता है।
ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में रुकावट आने से भारतीय कर्मचारियों के लिए नौकरी बदलने, प्रमोशन लेने और लंबे समय के करियर की योजना बनाने में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिका में घर खरीदने, बच्चों की शिक्षा और बचत जैसे महत्वपूर्ण फैसलों पर भी अनिश्चितता का असर पड़ सकता है।
इसका प्रभाव केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति, उन्हें अलग-अलग देशों में तैनात करने और आव्रजन नियमों के अनुपालन को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है। प्रभावित कंपनियां कानूनी विकल्प तलाश सकती हैं और अपनी नियुक्ति प्रक्रियाओं में बदलाव कर सकती हैं। दूसरी ओर, कुछ भारतीय पेशेवर दूसरे देशों में रोजगार के अवसर तलाश सकते हैं, जबकि कुछ भारत लौटने पर भी विचार कर सकते हैं।
H-1B वीजा, PERM और ग्रीन कार्ड में अंतर
H-1B एक अस्थायी गैर-आप्रवासी वीजा है, जिसके तहत योग्य विदेशी पेशेवर अमेरिका में निर्धारित शर्तों के अनुसार काम कर सकते हैं। PERM रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया का शुरुआती चरण है, जिसमें नियोक्ता को श्रम विभाग की निर्धारित शर्तें पूरी करनी होती हैं। इसके बाद संबंधित कर्मचारी की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के अन्य चरण पूरे किए जाते हैं।
फिलहाल, आठ कंपनियों से संबंधित PERM प्रक्रिया पर रोक ने उन कर्मचारियों की स्थायी निवास योजनाओं को अनिश्चित बना दिया है, जो अपने नियोक्ता के माध्यम से ग्रीन कार्ड पाने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि रोक कितने समय तक जारी रहेगी और इससे कुल कितने कर्मचारियों पर असर पड़ेगा।