कारगिल से किसानों तक, नाना पाटेकर की वो कहानी जो कम लोग जानते हैं

KNEWS DESK- नाना पाटेकर को हमने फिल्मों में देखा है. कभी गुस्से में दहाड़ते हुए, कभी गांव के आम आदमी की तरह और कभी ऐसे किरदार में, जो सीधे दिल में उतर जाए, लेकिन नाना पाटेकर की जिंदगी का एक हिस्सा ऐसा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग बात करते हैं.

1999 में जब कारगिल युद्ध चल रहा था, तब नाना पाटेकर सिर्फ मुंबई में बैठकर जवानों के लिए देशभक्ति की बातें नहीं कर रहे थे. उन्होंने सेना के साथ रहने की इच्छा जताई और तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से विशेष अनुमति ली. इसके बाद वे सेना के साथ करीब 60 दिन रहे और Quick Reaction Team का हिस्सा भी बने. यह कोई फिल्म का दृश्य नहीं था, बल्कि युद्ध के माहौल में सैनिकों के बीच बिताया गया वास्तविक समय था.

यही वजह है कि नाना पाटेकर के राष्ट्र प्रेम को सिर्फ उनकी फिल्मों या उनके बोले हुए शब्दों से नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने मुश्किल वक्त में जवानों के साथ खड़े होने का फैसला किया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.

कारगिल के बाद भी उनका जुड़ाव सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं रहा. महाराष्ट्र के किसानों की हालत, सूखा, पानी की कमी और किसान परिवारों की परेशानियों ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया. इसी सोच से 2015 में मकरंद अनासपुरे के साथ NAAM Foundation की शुरुआत हुई. संस्था किसानों और गांवों के लिए पानी संरक्षण, गांवों के विकास और संकट से जूझ रहे किसान परिवारों की मदद जैसे काम करती है. नाना ने एक जगह यह भी बताया कि किसान आत्महत्याओं की खबरों ने उन्हें इतना विचलित किया कि जिस पैसे से वे अपनी कार खरीदने वाले थे, उसे उन्होंने जरूरतमंद किसान परिवारों की मदद में लगाने का फैसला किया. यानी एक तरफ फिल्म का चमकता हुआ पर्दा है और दूसरी तरफ गांव की धूल, किसान की परेशानी और जवानों के बीच खड़े होने वाला नाना पाटेकर. शायद यही वजह है कि नाना पाटेकर को समझने के लिए उनकी फिल्में देखना ही काफी नहीं है. उनके उस जीवन को भी देखना होगा, जो कैमरा बंद होने के बाद शुरू होता है.

देशभक्ति के डायलॉग बोलना आसान है. लेकिन जब देश को जरूरत हो, तब अपने आराम से बाहर निकलकर कुछ करना अलग बात है और समाज के लिए काम करने के लिए भी बड़े मंच की जरूरत नहीं होती. कभी किसी किसान के घर पहुंचना, कभी गांव में पानी का इंतजाम करना और कभी किसी परेशान इंसान के साथ खड़ा हो जाना ही सबसे बड़ा काम बन जाता है.

नाना पाटेकर की यही सादगी और यही सामाजिक जुड़ाव उन्हें सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि पर्दे के बाहर भी याद रखे जाने वाला इंसान बनाता है.

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