समान काम करने वाले कर्मचारियों को हर स्थिति में बराबर वेतन मिले, यह जरूरी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि वेतन तय करने में अनुभव, भर्ती का तरीका, योग्यता, जिम्मेदारियां और जवाबदेही जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है।
Knews Desk- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल यह साबित कर देना पर्याप्त नहीं है कि दो कर्मचारी एक जैसा या मिलता-जुलता काम कर रहे हैं। समान वेतन का दावा करने के लिए यह भी दिखाना होगा कि दोनों कर्मचारियों की भर्ती, शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, नियुक्ति का तरीका और काम से जुड़ी जिम्मेदारियां व्यापक रूप से समान हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि समान काम के लिए समान वेतन का सिद्धांत सिर्फ काम की प्रकृति की सामान्य तुलना तक सीमित नहीं है। अदालत को यह देखना होगा कि वेतन समानता का दावा करने वाले कर्मचारियों के दोनों समूह सभी महत्वपूर्ण पहलुओं में एक-दूसरे के समान हैं या नहीं।
यह मामला केरल के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में जूनियर हायर सेकेंडरी शिक्षकों से जुड़ा था। इन शिक्षकों की नियुक्ति 1998 के एक सरकारी आदेश के तहत सीधे भर्ती के माध्यम से हुई थी। उन्होंने उसी कैडर में स्थानांतरण या पदोन्नति के जरिए पहुंचे शिक्षकों के समान पूर्णकालिक वेतनमान और भत्तों की मांग की थी।
सीधी भर्ती वाले शिक्षकों का तर्क था कि उनकी योग्यता, काम और जिम्मेदारियां दूसरे शिक्षकों के समान हैं, इसलिए उन्हें भी समान वेतन मिलना चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया और वेतन में अंतर को बरकरार रखा। अदालत ने पाया कि दोनों श्रेणियों के शिक्षकों के अनुभव में अंतर था।
कोर्ट ने कहा कि अनुभव में अंतर वेतनमान अलग होने का वैध आधार हो सकता है। इसके अलावा, भर्ती का स्रोत, शैक्षणिक योग्यता, नियुक्ति का तरीका, कर्तव्यों की प्रकृति, जिम्मेदारियां और जवाबदेही भी वेतन समानता तय करने में महत्वपूर्ण कारक हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि समान पद पर काम करने वाले और समान प्रकार का काम करने वाले कर्मचारियों को भी अलग-अलग वेतन मिल सकता है, यदि उनकी जिम्मेदारी, विश्वसनीयता या गोपनीय काम से जुड़ी भूमिका में वास्तविक अंतर हो। हालांकि, ऐसी वेतन संरचना के पीछे किया गया वर्गीकरण उचित और तर्कसंगत होना चाहिए तथा उसका संबंधित उद्देश्य से सीधा संबंध होना चाहिए।
अदालत की इस टिप्पणी का सार यह है कि ‘समान काम के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत हर मामले में स्वतः लागू नहीं किया जा सकता। वेतन समानता तय करते समय कर्मचारियों के अनुभव, योग्यता, भर्ती प्रक्रिया और जिम्मेदारियों समेत सभी प्रासंगिक पहलुओं की व्यापक तुलना जरूरी है।