गुंडा एक्ट उत्पीड़न का जरिया नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस को लगाई फटकार

गोंडा के जाहिद अली पर हुई कार्रवाई रद्द, कोर्ट ने कहा- सिर्फ लंबित मुकदमा किसी को आदतन अपराधी साबित नहीं करता

Knews Desk- उत्तर प्रदेश में गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के रवैये पर नाराजगी जताई है. कोर्ट ने गोंडा निवासी जाहिद अली के खिलाफ की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि इस कड़े कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को परेशान करने या उसका उत्पीड़न करने के लिए नहीं किया जा सकता.

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि राज्य सरकार गुंडा एक्ट को उत्पीड़न के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के अपने रवैये में बदलाव नहीं कर रही है.

गोंडा जिला प्रशासन ने 11 मई 2026 को जाहिद अली के खिलाफ उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट, 1970 के तहत कार्रवाई की थी. उन्हें गुंडा घोषित करते हुए छह महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर रहने का आदेश दिया गया था.

प्रशासन ने यह कार्रवाई वर्ष 2010 और 2020 के दो आपराधिक मुकदमों के अलावा पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट के आधार पर की थी.

2010 के मुकदमे में सात साल पहले हो चुके थे बरी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि जाहिद अली वर्ष 2010 के मुकदमे में 2017 में ही बरी हो चुके थे. इसके बावजूद पुलिस रिपोर्ट में इस मामले को उनके खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई के आधार के तौर पर शामिल किया गया.

कोर्ट ने कहा कि किसी मुकदमे में बरी हो चुके व्यक्ति की पुरानी आपराधिक संलिप्तता को इस तरह पेश नहीं किया जा सकता, जिससे उसे आदतन अपराधी बताने की कोशिश हो.

हाईकोर्ट ने वर्ष 2020 के मुकदमे को भी गुंडा एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना. कोर्ट ने साफ किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ एक मुकदमा लंबित होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह आदतन अपराधी है.

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि 2020 के मुकदमे और 2026 में गुंडा एक्ट के तहत की गई कार्रवाई के बीच करीब छह साल का अंतर था. ऐसे में कार्रवाई के लिए जरूरी उचित संबंध यानी रीजनेबल नेक्सस भी नजर नहीं आता.

बीट रिपोर्ट को लेकर भी पुलिस पर सवाल

जाहिद अली के खिलाफ कार्रवाई में पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट का भी सहारा लिया गया था. हालांकि, कोर्ट ने पाया कि इस सूचना के आधार पर कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था. साथ ही, जाहिद को इस आरोप पर अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया गया.

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को उचित सुनवाई का मौका दिए बिना ऐसी रिपोर्ट को गुंडा एक्ट की कार्रवाई का आधार बनाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है.

पुलिस रिपोर्ट में पुराने मामले का गलत इस्तेमाल

कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस को यह जानकारी होनी चाहिए थी कि जाहिद अली वर्ष 2010 के मामले में 2017 में बरी हो चुके हैं. इसके बावजूद उस मुकदमे को रिपोर्ट में शामिल किया गया.

हाईकोर्ट ने कहा कि गुंडा एक्ट एक बेहद शक्तिशाली कानून है, इसलिए इसका इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए. इसे सामान्य आपराधिक मामलों या किसी व्यक्ति को परेशान करने के लिए लागू नहीं किया जा सकता.

कोर्ट के मुताबिक, ऐसे कानून का इस्तेमाल सीमित परिस्थितियों में ही होना चाहिए, खासकर तब जब संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों से वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो.

हाईकोर्ट ने रद्द किए सभी आदेश

मामले में कोर्ट ने जाहिद अली को राहत देते हुए उनके खिलाफ गुंडा घोषित किए जाने का आदेश रद्द कर दिया. इसके साथ ही गोंडा जिले से छह महीने के लिए बाहर रहने का आदेश और कमिश्नर की ओर से उनकी अपील खारिज करने का फैसला भी निरस्त कर दिया गया.

इस तरह जाहिद अली के खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत की गई पूरी कार्रवाई खत्म हो गई.

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