KNews Desk: मोदी कैबिनेट में फेरबदल को लेकर चर्चाएं तेज हैं और कभी भी बदलाव का फैसला हो सकता है। संभावित फेरबदल के बाद कैबिनेट के स्वरूप को लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। पुराने रिकॉर्ड्स पर नजर डालें तो एक बात साफ दिखाई देती है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की कैबिनेट लगातार युवा होती गई है। ऐसे में इस बार भी अपेक्षाकृत युवा चेहरों को ज्यादा मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है।
लगातार घट रही मंत्रियों की औसत उम्र
2014 में जब मोदी कैबिनेट का गठन हुआ था, उस समय कैबिनेट मंत्रियों की औसत उम्र करीब 60 साल थी। 2019 में हुए कैबिनेट विस्तार में यह औसत घटकर 59 साल हो गई। वहीं 2024 में कैबिनेट के गठन के दौरान मंत्रियों की औसत उम्र करीब 58 साल रही। यानी पिछले एक दशक में कैबिनेट मंत्रियों की औसत उम्र में लगातार कमी देखने को मिली है।
फिलहाल मोदी कैबिनेट में कैबिनेट रैंक वाले 20 मंत्री ऐसे हैं, जिनकी उम्र 60 साल से ज्यादा है। इनमें जीतन राम मांझी सबसे उम्रदराज कैबिनेट मंत्री हैं। दूसरी ओर चिराग पासवान और राम मोहन नायडू ऐसे दो कैबिनेट मंत्री हैं, जिनकी उम्र 45 साल से कम है।
स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों में चार की उम्र 60 साल से ज्यादा है, जबकि एक मंत्री 60 साल से कम उम्र का है। वहीं केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल राज्य मंत्रियों की औसत उम्र करीब 57 साल है।
कैबिनेट और युवा क्यों हो सकती है?
पहला कारण: 2027 में उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में जेन-जी वोटर्स की हिस्सेदारी करीब 22 फीसदी बताई गई है। हाल के घटनाक्रमों में जेन-जी की नाराजगी सरकारों के लिए चुनौती बनती दिखाई दी है। ऐसे में युवा मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए कैबिनेट में युवा चेहरों को प्राथमिकता दिए जाने की संभावना है।
दूसरा कारण: मोदी सरकार की कैबिनेट पिछले तीन गठन में लगातार युवा हुई है। 2014 से 2024 के बीच कैबिनेट मंत्रियों की औसत उम्र में करीब दो साल की कमी आई है। इसी ट्रेंड को देखते हुए माना जा रहा है कि आगामी फेरबदल में भी औसत उम्र में कुछ और कमी देखने को मिल सकती है।
कौन बाहर होगा और किसे मिलेगी जगह?
कैबिनेट फेरबदल का पिछला ट्रेंड देखें तो हर बार बदलाव में कई चौंकाने वाले फैसले सामने आए हैं। आमतौर पर उन राज्यों को प्राथमिकता मिलती है, जहां चुनाव होने वाले होते हैं। इसके अलावा खराब प्रदर्शन करने वाले या विवादों में रहने वाले मंत्रियों को हटाने के उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। इस बार भी इन्हीं फैक्टर्स का असर देखने को मिल सकता है।
1. बिहार और महाराष्ट्र पर नजर
फिलहाल बिहार से मोदी कैबिनेट में कुल 8 मंत्री हैं। इनमें 4 कैबिनेट और 4 राज्य मंत्री हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। 2021 के कैबिनेट विस्तार में बिहार से आने वाले रविशंकर प्रसाद को मंत्रिमंडल से हटाया गया था। इस बार भी बिहार कोटे से कुछ मंत्रियों के बाहर होने की चर्चाएं हैं।
महाराष्ट्र और गुजरात से 6-6 मंत्री हैं। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव पहले ही संपन्न हो चुके हैं। वहीं पीयूष गोयल को हाल ही में बीजेपी का कोषाध्यक्ष बनाया गया है। हालांकि, उन्हें कैबिनेट से हटाया जाएगा या नहीं, इस पर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है।
2. यूपी और पंजाब से बढ़ सकती है हिस्सेदारी
उत्तर प्रदेश और पंजाब से कैबिनेट में नए चेहरों को जगह मिलने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी केंद्र में राज्य मंत्री हैं। वहीं पंजाब से बीजेपी कोटे की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। पंजाब कोटे से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल रवनीत बिट्टू हाल ही में इस्तीफा दे चुके हैं।
3. लेटरल एंट्री का विकल्प भी खुला
मोदी कैबिनेट में पहले भी ऐसे नेताओं को मंत्री बनाया गया है, जो उस समय लोकसभा या राज्यसभा के सदस्य नहीं थे। विदेश मंत्री एस. जयशंकर इसका बड़ा उदाहरण हैं। 2019 में विदेश मंत्री बनने के बाद वह राज्यसभा के जरिए संसद पहुंचे।
इसी तरह रवनीत बिट्टू और जॉर्ज कुरियन को भी मंत्री बनाए जाने के समय संसद सदस्य नहीं थे। ऐसे में आगामी फेरबदल में भी कुछ नए नेताओं की लेटरल एंट्री की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कुल मिलाकर, संभावित कैबिनेट फेरबदल में उम्र, राज्यों में होने वाले चुनाव, मंत्रियों का प्रदर्शन और क्षेत्रीय संतुलन जैसे कई फैक्टर अहम भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेतृत्व की ओर से लिए जाने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।