कोषाध्यक्ष से महामंत्री बने गोविंद देव गिरी, राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर फिर सवाल

KNews Desk: अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 2 सितंबर को अपने पहले CEO समेत कई नए पदाधिकारियों की नियुक्ति की। भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा को ट्रस्ट का CEO बनाया गया है। इसके अलावा तीन नए ट्रस्टी भी नियुक्त किए गए हैं। इसी फेरबदल में स्वामी गोविंद देव गिरी की जिम्मेदारी भी बदल दी गई है। अब वह ट्रस्ट के महामंत्री की भूमिका संभालेंगे। उन्होंने चंपत राय की जगह ली है। वहीं महेश भागचंदका को कोषाध्यक्ष बनाया गया है।

गोविंद देव गिरी को महामंत्री बनाए जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और वित्तीय गड़बड़ी का मामला सामने आने के समय वह ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष थे। ऐसे में वित्तीय व्यवस्था और कोष से जुड़ी जिम्मेदारी को लेकर उनकी भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। इसके बावजूद उन्हें पहले से बड़ी जिम्मेदारी दिया जाना चर्चा का विषय बन गया है।

चढ़ावा चोरी मामले में क्या हुआ था?

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और गबन का मामला जून 2026 के शुरुआती सप्ताह में सामने आया था। एसआईटी की जांच के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर 8 लोगों को गिरफ्तार किया। प्रबंधन की भूमिका पर सवाल उठने के बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में 14 करोड़ रुपये के चढ़ावा चोरी का आरोप लगाया गया था। हालांकि, ट्रस्ट की ओर से सुप्रीम कोर्ट में 3 करोड़ रुपये की चंदा चोरी की जानकारी दी गई थी।

गोविंद देव गिरी ने अपनी भूमिका पर क्या कहा?

चढ़ावा चोरी मामले के बाद गोविंद देव गिरी ने अपनी भूमिका को लेकर सफाई दी थी। उन्होंने कहा था कि वह ट्रस्ट के बैंक खातों के आधिकारिक हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं और उनके पास भुगतान के लिए कोई चेकबुक भी नहीं रहती थी। उनके मुताबिक, भुगतान सीधे बैंक ट्रांसफर के जरिए होता था।

उन्होंने यह भी कहा था कि वह पुणे में रहते थे और चढ़ावे की गिनती के लिए अयोध्या नहीं आते थे। यह काम स्थानीय ट्रस्टियों की देखरेख में होता था। उन्होंने दावा किया था कि कोषाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने कभी किसी से नकद या वस्तु के रूप में दान स्वीकार नहीं किया।

जब उनसे पूछा गया कि प्रबंधन के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों की तरह उन्होंने इस्तीफा क्यों नहीं दिया, तो उन्होंने साफ कहा था कि उनका इस मामले से कोई वास्ता नहीं है और इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता।

अब महामंत्री बनाए जाने पर सवाल क्यों?

गोविंद देव गिरी को महामंत्री बनाए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस समय वह कोषाध्यक्ष थे, उस दौरान चढ़ावा चोरी की घटना सामने आई। अगर उनकी सीधे तौर पर वित्तीय लेनदेन में भूमिका नहीं थी, तो क्या केवल पद के आधार पर उन पर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए थी? और अगर जिम्मेदारी नहीं बनती थी, तो अब उन्हें महामंत्री बनाने के पीछे ट्रस्ट की क्या सोच है?

हालांकि, ट्रस्ट की ओर से उनकी नई जिम्मेदारी को लेकर यह माना जा सकता है कि वह पुरानी टीम के अहम सदस्य हैं और उन्हें मंदिर के संचालन तथा प्रशासनिक कार्यों का लंबा अनुभव है। ऐसे में उनकी भूमिका बदलना ट्रस्ट के लिए प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने का फैसला भी हो सकता है।

लेकिन चढ़ावा चोरी विवाद अभी भी चर्चा में है। ऐसे में गोविंद देव गिरी को महामंत्री बनाए जाने के बाद यह सवाल बना हुआ है कि क्या नई जिम्मेदारी के साथ वह ट्रस्ट के प्रशासन और व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित कर पाएंगे।

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