सिंधु जल संधि पर भारत के खिलाफ फैसला, कौन हैं ये 5 जज? 2 का पाकिस्तान से कनेक्शन

Knews Desk: सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने भारत के सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले को मान्य नहीं माना और कहा कि 1960 की यह संधि अभी भी प्रभावी है। कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में रतले हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर भी अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया है। हालांकि भारत ने इस फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है और कहा है कि वह इस तथाकथित कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को ही स्वीकार नहीं करता।

इस पूरे मामले में कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच भी चर्चा में है। बेंच में अमेरिका, बेल्जियम, जॉर्डन और ऑस्ट्रेलिया के विशेषज्ञ शामिल हैं। पांच सदस्यों में अमेरिका के सीन डी. मर्फी और जेफरी पी. मिनियर, बेल्जियम के वाउटर ब्यूटार्ट, जॉर्डन के अवन शौकत अल-ख्शवानेह और ऑस्ट्रेलिया के डोनाल्ड ब्लैकमोरे शामिल हैं। इस बेंच ने सिंधु जल संधि को लेकर अपना फैसला सुनाया है।बेंच की अध्यक्षता अमेरिकी विशेषज्ञ सीन डी. मर्फी ने की। मर्फी अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ हैं और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानूनी मामलों में काम कर चुके हैं। उन्होंने अमेरिकी विदेश विभाग में भी कानूनी सलाहकार के तौर पर जिम्मेदारी संभाली है। अंतरराष्ट्रीय विवादों से जुड़े मामलों में उनका लंबा अनुभव रहा है।

बेंच के दूसरे अमेरिकी सदस्य जेफरी पी. मिनियर हैं। वह अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में लंबे अनुभव वाले विशेषज्ञ हैं और अमेरिकी सरकार के महत्वपूर्ण कानूनी पदों पर काम कर चुके हैं। वह अमेरिकी सॉलिसिटर जनरल के पद पर भी रह चुके हैं। इसके अलावा अमेरिकी विदेश विभाग में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।वाउटर ब्यूटार्ट बेल्जियम से हैं। उनका विशेषज्ञता क्षेत्र जल, पर्यावरण और तकनीकी मामलों से जुड़ा है। जल संसाधनों और हाइड्रोपावर से जुड़े तकनीकी पहलुओं की जानकारी के कारण उन्हें इस विवाद से जुड़ी कार्यवाही में शामिल किया गया। सिंधु जल विवाद में नदियों और जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े मुद्दे बेहद महत्वपूर्ण हैं।

पांचवें सदस्य अवन शौकत अल-ख्शवानेह जॉर्डन के वरिष्ठ न्यायविद हैं। वह अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मामलों में लंबा अनुभव रखते हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया के डोनाल्ड ब्लैकमोरे जल संसाधन और नदी प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने जल प्रबंधन से जुड़े कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में काम किया है।इन जजों को लेकर पाकिस्तान से कनेक्शन की चर्चा भी हो रही है। खास तौर पर ब्लैकमोरे के पाकिस्तान के साथ पुराने आधिकारिक संबंधों का जिक्र किया जा रहा है। हालांकि किसी जज को केवल उसकी राष्ट्रीयता या पुराने पेशेवर संबंधों के आधार पर पाकिस्तान का प्रतिनिधि बताना उचित नहीं होगा। आधिकारिक रिकॉर्ड में ये सभी कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के सदस्य के तौर पर दर्ज हैं।

दरअसल, भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद अप्रैल 2025 में सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला किया था। इसके बाद पाकिस्तान इस विवाद को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में लेकर गया। भारत ने इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया और लगातार कहा कि इस कोर्ट का गठन ही संधि के प्रावधानों के खिलाफ है। भारत का कहना है कि इस संस्था के पास उसके संप्रभु फैसलों पर आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारत के पास सिंधु जल संधि को एकतरफा तरीके से स्थगित करने का वैध आधार नहीं है और संधि लागू रहती है। रतले परियोजना को लेकर भी कुछ अंतरिम पाबंदियां लगाई गई हैं। हालांकि भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस फैसले को स्वीकार नहीं करता और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला जारी रहेगा। ऐसे में सिंधु जल संधि का विवाद केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत-पाकिस्तान के बीच कानूनी और कूटनीतिक टकराव का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है। भारत के फैसले को खारिज करने के बावजूद कोर्ट के आदेश का वास्तविक असर कितना होगा, यह आने वाले समय में भारत के रुख और दोनों देशों के बीच आगे होने वाली कूटनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगा।

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