Knews Desk: देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में शामिल IITs में छात्रों की आत्महत्या के मामले एक बार फिर चर्चा में हैं. IIT दिल्ली के MSc फिजिक्स के 31 वर्षीय छात्र ऋषिकेश कुमार की आत्महत्या के बाद कैंपस में छात्रों का प्रदर्शन जारी है. प्रदर्शनकारी छात्रों की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और संस्थान में ऐसा माहौल तैयार किया जाए, जहां किसी छात्र को अत्यधिक दबाव या परेशानी के कारण आत्महत्या जैसा कदम उठाने की स्थिति का सामना न करना पड़े.भारत में स्टूडेंट सुसाइड का मुद्दा सिर्फ IITs तक सीमित नहीं है. केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने संसद में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के आधार पर बताया था कि साल 2022 में देशभर में 13,044 छात्रों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए. यह देश में आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों का करीब 7.6 प्रतिशत था. आंकड़े बताते हैं कि छात्रों के बीच मानसिक और शैक्षणिक दबाव एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है.IITs की बात करें तो केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2018 से 2025 के बीच देश के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में 98 छात्रों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए. इनमें सबसे ज्यादा 39 मामले IITs से सामने आए. इसके बाद NITs में 25, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 25 और IIMs में 4 छात्रों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए.
IITs में छात्रों पर किस तरह का दबाव?
IIT जैसे संस्थानों में दाखिला लेने के लिए छात्रों को बेहद कठिन प्रतियोगी परीक्षा से गुजरना पड़ता है. एडमिशन के बाद भी पढ़ाई का स्तर और प्रतिस्पर्धा काफी अधिक रहती है. केंद्र सरकार ने संसद में छात्रों की आत्महत्या के संभावित कारणों में अकादमिक तनाव, परिवार की ओर से प्रदर्शन का दबाव, व्यक्तिगत समस्याएं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को प्रमुख वजहों में शामिल किया था.इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फोर्स ने भी छात्रों की समस्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान दिया. टास्क फोर्स के अनुसार जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव, अकादमिक दबाव, रैगिंग, आर्थिक परेशानी, मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा करने से जुड़ी झिझक और बदनामी का डर, दिव्यांगता तथा राजनीतिक विचार भी छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका है. कोर्ट ने कई मामलों में स्वत: संज्ञान लिया और छात्रों की आत्महत्या के कारणों का अध्ययन करने तथा रोकथाम के प्रभावी उपाय सुझाने के लिए नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया. इस पहल का उद्देश्य सिर्फ आत्महत्या के मामलों पर प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि संस्थानों में ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां छात्रों को समय रहते मदद मिल सके.
क्या हैं टास्क फोर्स के सुझाव?
नेशनल टास्क फोर्स ने देश के कई राज्यों और शैक्षणिक संस्थानों का दौरा किया. इसके अलावा ऑनलाइन सर्वे के जरिए करीब 80 हजार छात्रों, 10 हजार फैकल्टी सदस्यों, 15 हजार अभिभावकों और 700 से ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर्स से सुझाव लिए गए.टास्क फोर्स ने संस्थानों में पर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने, आत्महत्या के मामलों का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखने और छात्रों की शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी समितियां बनाने की सिफारिश की. इनमें एंटी-रैगिंग, आंतरिक शिकायत और समान अवसर प्रकोष्ठ जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया.
इसके अलावा संस्थानों में छात्रों और फैकल्टी के स्तर पर सामाजिक और श्रेणीगत विविधता सुनिश्चित करने की जरूरत भी बताई गई. विशेषज्ञों का मानना है कि केवल परीक्षा और अकादमिक प्रदर्शन पर ध्यान देने के बजाय छात्रों की मानसिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियों और व्यक्तिगत समस्याओं को भी समझना जरूरी है.IIT दिल्ली में जारी प्रदर्शन के बीच एक बार फिर यह सवाल सामने है कि देश के शीर्ष संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को बेहतर अकादमिक सुविधाओं के साथ सुरक्षित और संवेदनशील वातावरण कैसे दिया जाए. छात्रों की मांग और सुप्रीम कोर्ट की चिंता के बीच अब संस्थानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मानसिक स्वास्थ्य सहायता और शिकायत निवारण व्यवस्था को केवल कागजों तक सीमित न रखकर जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू किया जाए.