ज्यूडिशियल सर्विस में 3 साल की प्रैक्टिस पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 2027 तक मिली बड़ी राहत

Knews Desk- ज्यूडिशियल सर्विस में भर्ती की तैयारी कर रहे लॉ ग्रेजुएट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एंट्री-लेवल ज्यूडिशियल सर्विस के लिए तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस से जुड़े 2025 के अपने फैसले में बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत 31 मार्च 2027 तक उम्मीदवारों को तीन साल की पूरी प्रैक्टिस की शर्त से छूट मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस ट्रांजिशन पीरियड के दौरान लॉ ग्रेजुएट्स बिना तीन साल की प्रैक्टिस पूरी किए ज्यूडिशियल सर्विस के लिए आवेदन कर सकेंगे। हालांकि, उन्हें पात्रता के लिए कम से कम एक साल की एक्टिव प्रैक्टिस पूरी करने वाला माना जाएगा।

कोर्ट के मुताबिक चयनित उम्मीदवारों को सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी के रूप में जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। उन्हें पहले ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर के तौर पर काम करना होगा।

इसके तहत उम्मीदवारों को स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी में एक साल की गहन ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके बाद छह महीने डिस्ट्रिक्ट जज या हायर ज्यूडिशियल सर्विस के तहत क्लर्कशिप और छह महीने हाई कोर्ट के मौजूदा जज के साथ क्लर्कशिप करनी होगी।

कोर्ट ने कहा कि ट्रेनिंग और क्लर्कशिप के जरिए उम्मीदवारों को जरूरी व्यावहारिक अनुभव हासिल होगा।

1 अप्रैल 2027 से बदल जाएगा नियम

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली ज्यूडिशियल सर्विस भर्तियों में आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के लिए कम से कम एक साल की एक्टिव प्रैक्टिस अनिवार्य होगी।

इसके अलावा हाई कोर्ट्स को तीन महीने के भीतर अपने संबंधित ज्यूडिशियल सर्विस नियमों में जरूरी बदलाव करने के निर्देश दिए गए हैं।

नई व्यवस्था पांच साल तक लागू रहेगी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट इस बात की समीक्षा करेगा कि इस व्यवस्था से न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों की गुणवत्ता और व्यावहारिक अनुभव पर क्या असर पड़ा।

सीजेआई ने क्या कहा?

फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायिक सेवा में प्रवेश से पहले उम्मीदवार के पास कानूनी पेशे का अनुभव होना जरूरी है और इस बुनियादी विचार में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि अनुभव की शर्त का उचित और व्यावहारिक आधार होना चाहिए, ताकि उम्मीदवारों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने इस फैसले से असहमति जताई। वहीं, रिव्यू याचिकाओं को खारिज कर दिया गया।

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