सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की जगह जहरीले इंजेक्शन से मौत की सजा देने की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इंजेक्शन को फांसी से ज्यादा मानवीय या कम पीड़ादायक साबित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं हैं।
Knews Desk- मौत की सजा को लेकर सबसे बड़ा सवाल सिर्फ सजा का नहीं, बल्कि उसे लागू करने के तरीके का भी है। दुनिया के अलग-अलग देशों में फांसी, जहरीला इंजेक्शन और गोली मारने जैसे तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं। आम धारणा है कि जहरीला इंजेक्शन अपेक्षाकृत आधुनिक और कम तकलीफदेह तरीका है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किए गए मामले में इस दावे को पर्याप्त वैज्ञानिक आधार नहीं मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने ऋषि मल्होत्रा बनाम भारत संघ मामले में फांसी की मौजूदा व्यवस्था को बदलकर जहरीले इंजेक्शन को अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि ऐसा कोई निर्णायक वैज्ञानिक सबूत सामने नहीं रखा गया, जिससे जहरीले इंजेक्शन को फांसी से ज्यादा मानवीय तरीका माना जा सके।
जहरीले इंजेक्शन में भी हैं कई चुनौतियां
याचिकाकर्ता की दलील थी कि दवाओं के जरिए मौत देना ज्यादा वैज्ञानिक और कम पीड़ादायक हो सकता है। लेकिन कोर्ट ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरीके की विश्वसनीयता और मानवीयता साबित करने के लिए पर्याप्त अनुभवजन्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन के दौरान कई बार प्रक्रिया में गंभीर परेशानियां सामने आ चुकी हैं। खास तौर पर नस में कैथेटर लगाने में कठिनाई, दवाओं की उपलब्धता और इस्तेमाल किए जाने वाले प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
अमेरिका का थॉमस क्रीच मामला
सुप्रीम कोर्ट के सामने अमेरिका के इडाहो का थॉमस क्रीच मामला भी रखा गया। फरवरी 2024 में क्रीच को जहरीले इंजेक्शन के जरिए मृत्युदंड देने की कोशिश की गई थी। मेडिकल टीम ने नस में कैथेटर लगाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन सफलता नहीं मिली। करीब दो घंटे की कोशिश के बाद प्रक्रिया रोकनी पड़ी और उसे वापस सेल में ले जाया गया।
इस मामले का उदाहरण यह बताने के लिए दिया गया कि जहरीला इंजेक्शन भी हर स्थिति में सरल या सफल तरीका नहीं है।
क्या फांसी निश्चित रूप से कम दर्दनाक है?
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला नहीं दिया कि फांसी जहरीले इंजेक्शन से कम दर्दनाक है। कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य आधार यह था कि इंजेक्शन को बेहतर और अधिक मानवीय साबित करने वाला ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उसके सामने नहीं था।
याचिकाकर्ता की ओर से फांसी को शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद कठिन प्रक्रिया बताया गया, लेकिन इस दावे के समर्थन में भी ऐसा निर्णायक वैज्ञानिक या अनुभव आधारित प्रमाण नहीं दिया गया, जिससे मौजूदा व्यवस्था को बदलना जरूरी माना जा सके।
1983 में भी सुप्रीम कोर्ट कर चुका है विचार
मौत की सजा देने के तरीकों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी विचार कर चुका है। Deena बनाम Union of India मामले में 1983 में तीन जजों की पीठ ने फांसी के अलावा बिजली का झटका, जहरीली गैस, गोली मारना और जहरीले इंजेक्शन जैसे विकल्पों पर चर्चा की थी।
उस समय भी कोर्ट को ऐसा कोई स्पष्ट फायदा नजर नहीं आया था, जिसके आधार पर फांसी की जगह किसी दूसरे तरीके को अनिवार्य रूप से अपनाया जाए।
आखिर सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष क्या है?
ताजा मामले में कोर्ट ने मूल रूप से यही कहा कि किसी वैकल्पिक तरीके को अपनाने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि वह मौजूदा तरीके से ज्यादा सुरक्षित, विश्वसनीय और मानवीय है। जहरीले इंजेक्शन के मामले में ऐसा निर्णायक प्रमाण सामने नहीं आया।
इसलिए फिलहाल भारत में मौत की सजा देने का कानूनी तरीका फांसी ही बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक बार फिर यह बहस जरूर तेज कर दी है कि मृत्युदंड के मामले में सजा के साथ-साथ उसे लागू करने के तरीके को लेकर वैज्ञानिक और मानवीय मानकों पर कितना विचार किया जाना चाहिए।