सर्जियो गोर के श्रीनगर दौरे ने बदली तस्वीर, पुराने दौर में अलगाववादी नेताओं से मुलाकात को लेकर उठे थे सवाल
Knews Desk- भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के जम्मू-कश्मीर दौरे ने एक बार फिर घाटी में अमेरिकी कूटनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. श्रीनगर पहुंचे गोर ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और कश्मीर की खूबसूरती की तारीफ करते हुए इसे भारत का अहम हिस्सा बताया. उनके इस बयान को भारत-अमेरिका संबंधों और कश्मीर को लेकर अमेरिकी रुख में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
अमेरिकी राजदूत का श्रीनगर जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि पिछले करीब तीन दशकों में घाटी का दौरा करने वाले अमेरिकी राजदूतों के दौरे अलग-अलग वजहों से चर्चा में रहे हैं. कभी अलगाववादी नेताओं से मुलाकात को लेकर विवाद हुआ तो कभी सुरक्षा और राजनीतिक हालात का जायजा लेने पर जोर रहा.
गोर ने कश्मीर को बताया भारत का अहम हिस्सा
सर्जियो गोर ने श्रीनगर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद कहा कि जम्मू-कश्मीर बेहद खूबसूरत है और यहां आकर उन्हें खुशी हुई. उन्होंने कश्मीर को भारत का अहम हिस्सा बताते हुए दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत करने की इच्छा भी जताई.
गोर का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब भारत और अमेरिका के रिश्ते रक्षा, तकनीक, व्यापार, महत्वपूर्ण खनिजों और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग जैसे कई क्षेत्रों में लगातार मजबूत हुए हैं.
1995 में फ्रैंक विस्नर के दौरे पर हुआ था विवाद
1990 के दशक में घाटी आतंकवाद और हिंसा से जूझ रही थी. इसी दौर में 1995 में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत फ्रैंक विस्नर ने श्रीनगर का दौरा किया था. उन्होंने सरकारी अधिकारियों और मुख्यधारा के नेताओं के अलावा अलगाववादी नेताओं, छात्रों, शिक्षाविदों, पत्रकारों और व्यापारिक प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की थी.
अलगाववादी समूहों के साथ उनकी बातचीत को लेकर भारत में सवाल उठे थे. उस समय कश्मीर को लेकर अमेरिकी नीति में भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन साधने की कोशिश साफ नजर आती थी.
कारगिल युद्ध के दौरान बदला अमेरिकी रुख
1999 के कारगिल युद्ध ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को बेहद तनावपूर्ण बना दिया था. इस दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर नियंत्रण रेखा के पीछे अपनी सेना वापस बुलाने का दबाव बनाया.
वॉशिंगटन ने यह स्पष्ट किया कि संघर्ष को आगे बढ़ने देना पूरे क्षेत्र के लिए खतरनाक हो सकता है. कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका की भूमिका ने भारत-अमेरिका संबंधों में एक नए दौर की शुरुआत के संकेत दिए.
9/11 के बाद अमेरिका का फोकस आतंकवाद पर
2001 में अमेरिका पर हुए 9/11 आतंकी हमलों के बाद उसकी विदेश और सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव आया. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अमेरिकी रणनीति का प्रमुख हिस्सा बन गई.
2002 में अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट ब्लैकविल ने कश्मीर का दौरा किया. उन्होंने नियंत्रण रेखा के आसपास की स्थिति का जायजा लिया और सुरक्षा हालात को समझने की कोशिश की. हालांकि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती की तरह अलगाववादी नेताओं से मुलाकात नहीं की.
टिमोथी रोमर और केनेथ जस्टर भी पहुंचे घाटी
इसके बाद अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर ने भी जम्मू-कश्मीर का दौरा किया. 2011 में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की थी. उनका दौरा मुख्य रूप से आधिकारिक और संस्थागत संपर्कों तक सीमित रहा.
2019 में केंद्र सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने और संवैधानिक बदलावों के बाद जनवरी 2020 में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत केनेथ जस्टर भी घाटी पहुंचे थे. वह जम्मू-कश्मीर का दौरा करने वाले विदेशी राजनयिकों के प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे.
अब कश्मीर पर अमेरिकी नीति में दिख रहा बदलाव
तीन दशक के इन दौरों को देखें तो अमेरिकी राजदूतों के कश्मीर दौरे की प्राथमिकताएं समय के साथ बदलती नजर आती हैं. 1990 के दशक में जहां अलग-अलग राजनीतिक और अलगाववादी समूहों से संपर्क पर जोर दिखाई देता था, वहीं बाद के वर्षों में आतंकवाद, सुरक्षा और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी ज्यादा अहम हो गई.
सर्जियो गोर के हालिया दौरे में किसी मध्यस्थता या नई कूटनीतिक पहल की बात सामने नहीं आई. इसके बजाय उन्होंने कश्मीर को भारत का अहम हिस्सा बताया. यही वजह है कि उनके बयान को पुराने अमेरिकी रुख की तुलना में काफी अलग माना जा रहा है.
हालांकि पाकिस्तान ने गोर के बयान पर आपत्ति जताई है. इसके बावजूद मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत देता है कि कश्मीर को लेकर अमेरिकी नीति अब पारंपरिक भारत-पाकिस्तान संतुलन से आगे बढ़कर भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को अधिक महत्व दे रही है.