18-18 घंटे काम, न ढंग का खाना… पर्दे को रोशन करने वाले बॉलीवुड के लाइटमैन की जिंदगी में कितना अंधेरा?

KNEWS DESK – बड़े पर्दे पर जब कोई फिल्म खूबसूरत रोशनी और शानदार विजुअल्स के साथ दिखाई देती है, तो उसके पीछे कैमरे के सामने मौजूद सितारों के अलावा सैकड़ों लोगों की मेहनत होती है। इनमें लाइटमैन भी शामिल हैं, जो शूटिंग सेट की पूरी लाइटिंग संभालते हैं। लेकिन पर्दे को चमकाने वाले इन लोगों की अपनी जिंदगी कई मुश्किलों से भरी हुई है।

लंबे वर्किंग ऑवर्स, कम दिहाड़ी, ओवरटाइम के पैसे न मिलना और पेमेंट के लिए महीनों इंतजार करना… दिल्ली में काम करने वाले कई लाइटमैन ने अब फिल्म इंडस्ट्री की इन परेशानियों को खुलकर सामने रखा है।

प्रोडक्शन हाउस रीलज़ेन क्रिएटिव की एक डॉक्यू-सीरीज में दिल्ली के कई लाइटमैन ने अपने काम और उससे जुड़ी चुनौतियों के बारे में बात की है।

रात 2-3 बजे से शुरू हो जाता है काम

शूटिंग सेट पर लाइटमैन का काम कैमरा ऑन होने से काफी पहले शुरू हो जाता है। दिल्ली की वाइड लाइट के मालिक सूरज गौतम ने बताया कि कई बार उन्हें रात 3 बजे का कॉल टाइम तक देना पड़ता है।

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इसकी वजह यह है कि शूट शुरू होने से पहले सेट पर लाइटिंग का पूरा इंतजाम करना होता है। कैमरा और कलाकारों के आने तक लाइट्स सही जगह पर लगानी होती हैं, उनकी सेटिंग करनी होती है और शूट के हिसाब से पूरा सेट तैयार रखना पड़ता है।

फ्रीलांस लाइटमैन दिनेश भारती के मुताबिक, उनके काम का कोई तय समय नहीं होता। कभी उन्हें रात 2 बजे काम शुरू करना पड़ता है तो कभी सुबह 5 बजे।

10 घंटे काम करें या 18, मिलते हैं 1800 रुपये?

लाइटमैन की सबसे बड़ी शिकायत उनकी दिहाड़ी को लेकर है। उनका कहना है कि एक दिन काम करने के लिए उन्हें करीब 1,800 रुपये मिलते हैं।

समस्या यह है कि शूटिंग अगर 10 घंटे में खत्म हो जाए या 17-18 घंटे तक चले, कई बार उनका मेहनताना लगभग उतना ही रहता है।

दिनेश भारती के मुताबिक, 17 से 18 घंटे काम करने के बाद कभी-कभी ओवरटाइम दिया जाता है। लेकिन अगर तय समय से कुछ घंटे ज्यादा काम कराया जाता है तो उसका अलग से पैसा नहीं मिलता।

लाइटमैन का कहना है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है और उनके काम में भी काफी शारीरिक मेहनत लगती है। ऐसे में अब वह अपनी दिहाड़ी को 1,800 रुपये से बढ़ाकर कम से कम 2,000 रुपये करने की मांग कर रहे हैं।

‘सबसे ज्यादा मेहनत, फिर भी पैसे कम’

दिनेश भारती ने लाइटमैन की स्थिति को लेकर कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में उनका काम बेहद मेहनत वाला है, लेकिन इसके मुकाबले मिलने वाला पैसा काफी कम है। लाइटिंग का सामान उठाने से लेकर उसे सेट पर लगाने और शूट के दौरान लगातार जरूरत के हिसाब से बदलाव करने तक लाइटमैन को लंबे समय तक काम करना पड़ता है। इसके बावजूद उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत को उस तरह की पहचान और सुविधाएं नहीं मिलतीं, जिसके वे हकदार हैं।

पेमेंट के लिए 2-3 महीने का इंतजार

सिर्फ कम दिहाड़ी ही नहीं, समय पर पेमेंट नहीं मिलना भी लाइटमैन के लिए बड़ी परेशानी बन चुका है। सूरज गौतम के मुताबिक, जब लाइटमैन या स्पॉट बॉय का भुगतान करने की बारी आती है तो कई बार निर्माता पैसों की कमी का हवाला देने लगते हैं। वहीं फ्रीलांस लाइटमैन अमर सिंह ने बताया कि पहले शूटिंग पूरी होने के बाद उसी दिन पैसे मिल जाया करते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। उनका कहना है कि ऑनलाइन ट्रांजैक्शन का दौर होने के बावजूद कई बार भुगतान के लिए दो से तीन महीने तक इंतजार करना पड़ता है।

‘काम तुरंत चाहिए, पैसे समय पर नहीं’

लाइटमैन की शिकायत है कि प्रोडक्शन से जुड़े लोगों को काम तो समय पर और तुरंत चाहिए, लेकिन जब भुगतान की बारी आती है तो उन्हें लंबा इंतजार कराया जाता है।

इस देरी का सीधा असर उनके घर के खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ता है। लंबे समय तक पेमेंट अटका रहने की वजह से उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में कैमरे के पीछे काम करने वाले लाइटमैन किसी भी शूट का अहम हिस्सा होते हैं। कलाकारों को पर्दे पर सही तरीके से पेश करने से लेकर हर सीन का माहौल तैयार करने तक उनकी भूमिका बेहद जरूरी होती है। इसके बावजूद इन वर्कर्स का कहना है कि बेहतर मेहनताना, तय वर्किंग ऑवर्स और समय पर पेमेंट जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए आज भी उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है।

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