भूख हड़ताल पर कब कर सकती है सरकार दखल? जानिए कानून क्या कहता है

Knews Desk- सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को 20 दिन तक चली भूख हड़ताल के बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर से हटाकर नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है। उनकी बिगड़ती सेहत और डॉक्टरों द्वारा अंगों के प्रभावित होने की आशंका जताए जाने के बाद यह कदम उठाया गया। इस घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या भूख हड़ताल करना गैरकानूनी है? यदि कोई व्यक्ति इलाज कराने से इनकार करता है, तो क्या सरकार उसे जबरन अस्पताल में भर्ती करा सकती है? आइए जानते हैं कानून इस बारे में क्या कहता है।भारत में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है। संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक एकत्र होकर विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। इसी अधिकार के तहत लोग धरना, प्रदर्शन और भूख हड़ताल जैसे माध्यम अपनाते हैं। हालांकि यह अधिकार पूर्ण रूप से असीमित नहीं है। सरकार सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंध लगा सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, केवल भूख हड़ताल करना अपने-आप में कोई अपराध नहीं है। यदि विरोध शांतिपूर्ण हो, किसी प्रकार की हिंसा न हो और उससे आम जनता या सरकारी व्यवस्था प्रभावित न हो, तो इसे लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा माना जाता है। लेकिन यदि प्रदर्शन के कारण सड़क जाम हो, हिंसा फैलने का खतरा हो, सरकारी कामकाज बाधित हो या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो, तो प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है।

भूख हड़ताल को आत्महत्या की कोशिश मानना भी कानूनी रूप से सही नहीं माना जाता। पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) में आत्महत्या के प्रयास को अपराध माना जाता था, लेकिन अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के लागू होने के बाद कानून का दृष्टिकोण काफी बदल चुका है। मानसिक तनाव या गंभीर परिस्थितियों में व्यक्ति को अपराधी नहीं बल्कि उपचार और सहायता की आवश्यकता वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है।विशेषज्ञों का कहना है कि भूख हड़ताल का उद्देश्य आमतौर पर किसी सामाजिक, राजनीतिक या सार्वजनिक मुद्दे की ओर सरकार और समाज का ध्यान आकर्षित करना होता है। इसलिए इसे आत्महत्या के प्रयास के बराबर नहीं माना जा सकता। हालांकि, यदि किसी व्यक्ति की जान को तत्काल खतरा हो, वह इलाज से पूरी तरह इनकार कर दे और डॉक्टरों को अंगों के फेल होने या मृत्यु का खतरा दिखाई दे, तो प्रशासन और चिकित्सा अधिकारी उसकी जान बचाने के लिए हस्तक्षेप कर सकते हैं।

इसी कारण कई मामलों में अदालतें भी सरकार को प्रदर्शनकारी के स्वास्थ्य की निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश देती रही हैं। ऐसे मामलों में सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी व्यक्ति के जीवन की रक्षा करना होती है। यदि मेडिकल टीम यह मानती है कि इलाज में देरी से जान का खतरा बढ़ सकता है, तो प्रशासन अस्पताल में भर्ती कराने या आवश्यक चिकित्सकीय कदम उठाने का निर्णय ले सकता हैभूख हड़ताल का शरीर पर भी गंभीर असर पड़ता है। शुरुआती दिनों में शरीर ऊर्जा के लिए ग्लूकोज और वसा का उपयोग करता है, लेकिन लंबे समय तक भोजन न मिलने पर मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है, रक्तचाप कम हो सकता है और दिल, किडनी तथा लिवर जैसे महत्वपूर्ण अंग प्रभावित होने लगते हैं। लंबे समय तक भूख हड़ताल जारी रहने पर अंगों के फेल होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

सोनम वांगचुक के मामले में भी डॉक्टरों ने लंबे समय तक भोजन न लेने के कारण स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी केंद्र और दिल्ली सरकार को उनके स्वास्थ्य की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने और जरूरत पड़ने पर उचित चिकित्सा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।कुल मिलाकर, भारतीय कानून शांतिपूर्ण भूख हड़ताल को लोकतांत्रिक अधिकार मानता है, लेकिन जब किसी व्यक्ति के जीवन पर गंभीर खतरा मंडराने लगे, तब सरकार और चिकित्सा तंत्र की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाना भी होती है। ऐसे मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना ही प्रशासन और न्यायपालिका की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *