Knews Desk- ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा का शुभारंभ आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से हो गया है। यह केवल ओडिशा ही नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर, जिसे भगवान की मौसी का घर भी कहा जाता है, की यात्रा पर निकलते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस रथयात्रा में शामिल होकर भगवान के दर्शन करने और रथ की रस्सी खींचने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है तथा उसे विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।रथयात्रा का आयोजन हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता है। भगवान जगन्नाथ कुछ दिनों के लिए गुंडिचा मंदिर में विश्राम करते हैं और इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। वर्ष 2026 में रथयात्रा का शुभारंभ 16 जुलाई से हुआ है, जबकि 24 जुलाई को बहुदा यात्रा निकाली जाएगी। इसके बाद 27 जुलाई को नीलाद्री बीजे अनुष्ठान के साथ इस महापर्व का समापन होगा। इस वर्ष रथयात्रा के दिन रवि योग का भी विशेष संयोग बन रहा है, जिससे इस पर्व का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की यह यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि प्रेम, समानता और समर्पण का प्रतीक है। इस दिन जाति, धर्म और वर्ग का कोई भेद नहीं रहता। लाखों श्रद्धालु एक साथ भगवान के रथ को खींचते हैं और स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। मान्यता है कि रथ की रस्सी को स्पर्श करने या उसे खींचने मात्र से भी व्यक्ति को कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।रथयात्रा के लिए हर वर्ष विशेष परंपराओं का पालन करते हुए नीम की लकड़ी से तीन भव्य रथ तैयार किए जाते हैं। सबसे आगे भगवान बलभद्र का रथ ‘तालध्वज’ चलता है, जिसका रंग लाल और हरा होता है। इसके पीछे देवी सुभद्रा का रथ ‘दर्पदलन’ या ‘पद्मरथ’ चलता है, जिसे नीले और काले रंग से सजाया जाता है। सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का विशाल रथ ‘नंदिघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ चलता है, जो लाल और पीले रंग से सुसज्जित होता है। इन रथों का निर्माण पारंपरिक नियमों और धार्मिक विधि-विधान के अनुसार किया जाता है।
रथयात्रा के दौरान श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA), छत्तीस निजोग और विभिन्न अनुष्ठान समितियां मिलकर पूरे कार्यक्रम का संचालन करती हैं। तय कार्यक्रम के अनुसार, आज शाम भगवान के रथों को श्रद्धालुओं द्वारा खींचा जाएगा। इस ऐतिहासिक अवसर को देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं और भगवान के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते हैं।भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सनातन परंपरा में सेवा, भक्ति और समर्पण का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से भगवान का स्मरण करते हुए रथयात्रा में शामिल होता है, उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। यही कारण है कि पुरी की रथयात्रा को दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पवित्र धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है।