डिजिटल डेस्क- महाराष्ट्र की सियासत के सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल राजनीतिक हत्याकांडों में से एक, ‘पवनराजे निंबालकर मर्डर केस’ में शनिवार को सीबीआई की विशेष अदालत ने एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले के मुख्य आरोपी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता पद्मसिंह पाटिल समेत सभी 9 आरोपियों को पुख्ता सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। इस अदालती फैसले के साथ ही लगभग दो दशकों से चली आ रही एक लंबी और जटिल कानूनी लड़ाई का अंत हो गया है। गौरतलब है कि कांग्रेस नेता पवनराजे निंबालकर और उनके वफादार ड्राइवर समद काजी की 3 जून 2006 को नवी मुंबई के कलंबोली इलाके में सरेराह गोली मारकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, जिसकी जांच बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई थी। इस बहुप्रतीक्षित फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों में सुबह से ही भारी हलचल देखी गई। फैसले से ठीक पहले बड़ी संख्या में राजनीतिक नेता, दोनों पक्षों के परिवार और सैकड़ों समर्थक कोर्ट परिसर के बाहर जमा हो गए थे। पवनराजे निंबालकर के बेटे और शिवसेना (यूबीटी) के मौजूदा सांसद ओमराजे निंबालकर अपने पूरे परिवार के साथ न्याय की उम्मीद में अदालत पहुंचे थे, वहीं दूसरी तरफ पूर्व एनसीपी नेता पद्मसिंह पाटिल भी अपने करीबियों के साथ कोर्ट रूम में मौजूद रहे। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में पद्मसिंह पाटिल को इस दोहरे हत्याकांड की कथित साजिश का मुख्य सूत्रधार बताया था। उनके अलावा सतीश मांडाडे, मोहन शुक्ला, दिनेश तिवारी, परसमल जैन, कैलाश यादव, पिंटू सिंह और शूटर छोटू पांडे को प्रमुख आरोपी बनाया गया था, जिन्हें अब अदालत से बड़ी राहत मिल गई है।
सरकारी गवाह के मुकरने और संदेहास्पद बयानों पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए अभियोजन पक्ष के सबसे बड़े हथियार यानी ‘माफी के गवाह’ (सरकारी गवाह) की भूमिका पर बेहद तल्ख टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि अगर इस चश्मदीद गवाह की पूरी कानूनी यात्रा पर नजर डालें, तो उसने पहले जुर्म कबूल किया और बाद में अदालत में अपने ही बयान से पूरी तरह मुकर गया। गवाह ने दावा किया कि जांच एजेंसियों द्वारा उसे बुरी तरह मारा-पीटा गया, मानसिक रूप से धमकाया गया, जरूरी दवाइयां नहीं दी गईं, फर्जी एनकाउंटर का खौफ दिखाया गया और उसके परिवार को जान से मारने की चेतावनी दी गई थी। गवाह ने नया मोड़ लेते हुए यह भी कहा कि घटना वाले दिन वह अपने मूल गांव में मौजूद था, जिसकी पुष्टि उसके रिश्तेदारों ने भी की। अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम और गवाह के यू-टर्न को बेहद संदेहास्पद माना। कोर्ट ने जिक्र किया कि इस गवाह ने पहले अदालत में आवेदन देकर कहा था कि बाकी सभी आरोपी जमानत पर बाहर घूम रहे हैं, जबकि उसे अकेले जेल में फंसाकर रखा गया है। इसके बाद ही उसने अपनी रिहाई की जुगत में माफी का गवाह बनने का रास्ता चुना था, जिसने कोर्ट को और ज्यादा सतर्क कर दिया। इसके अलावा, अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि वह गवाह आर्थिक रूप से काफी संपन्न व्यवसायी था, जिसके पास कई फ्लैट और बड़ी संपत्तियां थीं। उसका कोई भी बिजनेस घाटे में नहीं चल रहा था, इसलिए महज 50 हजार रुपये की मामूली रकम के लिए उसके इस खौफनाक साजिश में शामिल होने की थ्योरी व्यावहारिक रूप से गले नहीं उतरती।
सीबीआई जांच की बड़ी खामियों को कोर्ट ने किया उजागर
फैसले के दौरान विशेष अदालत ने केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) द्वारा की गई तफ्तीश की गंभीर लापरवाही और कमियों को भी जनता के सामने रखा। कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े राजनीतिक हत्याकांड में जांच अधिकारियों ने आरोपियों के मोबाइल फोन तक जब्त नहीं किए, न ही उनकी कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) मंगवाने की जहमत उठाई। यहाँ तक कि गिरफ्तारी के वक्त आरोपियों के पास से क्या-क्या सामान बरामद हुआ, इसका भी कोई पुख्ता रिकॉर्ड मेंटेन नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि यदि समय रहते मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए होते, तो नंबरों के आधार पर आसानी से यह कड़ियां जोड़ी जा सकती थीं कि साजिश के वक्त कौन किसके लगातार संपर्क में था। हालांकि सरकारी पक्ष ने दलील दी कि उस दौर में सीडीआर आसानी से उपलब्ध नहीं थे, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कम से कम मोबाइल नंबरों के जरिए आपसी संपर्कों की सामान्य जांच तो की ही जा सकती थी।
128 गवाहों की गवाही के बाद खत्म हुआ महाराष्ट्र का सबसे लंबा मुकदमा
विशेष न्यायाधीश ने फैसला पढ़ते हुए भावुक शब्दों में कहा, “किसी न किसी कारणवश इस बेहद संवेदनशील मामले के ट्रायल में बहुत देरी हुई और आज मैं पूरे 20 सालों के बाद यह फैसला सुना रहा हूँ। एक जननेता की इस तरह से दिनदहाड़े हत्या कर दिया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद घटना थी।” याद दिला दें कि इस हत्याकांड की प्रारंभिक जांच सबसे पहले नवी मुंबई पुलिस द्वारा की गई थी, लेकिन निंबालकर परिवार ने जांच की कछुआ चाल और स्थानीय प्रभाव को देखते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसके बाद हाई कोर्ट ने मामला सीबीआई को ट्रांसफर किया था। इस हाई-प्रोफाइल केस में मुख्य आरोपी पद्मसिंह पाटिल को साल 2009 में गिरफ्तार किया गया था और उसी साल उन्हें जमानत भी मिल गई थी। जुलाई 2011 में शुरू हुए इस औपचारिक ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 128 गवाहों को अदालत के सामने पेश किया, लेकिन अंततः साक्ष्यों की कमी के चलते यह केस मर्डर मिस्ट्री बनकर ही रह गया।