डिजिटल डेस्क- उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के हथगाम थाना क्षेत्र स्थित पट्टीशाह गांव में साल 2008 में शुरू हुए एक खूनी संघर्ष और वर्चस्व की जंग में अदालत ने अब अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। सत्र न्यायाधीश सुधीर कुमार ने सात दिसंबर 2008 को हुए सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड के मामले में शुक्रवार को तीन सगे भाइयों समेत कुल 14 अभियुक्तों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई है। इसके साथ ही कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सभी दोषियों पर 38-38 हजार रुपये का भारी-भरकम अर्थदंड भी लगाया है। करीब 18 वर्षों तक चले इस लंबे और पेचीदा मुकदमे में 210 से अधिक तारीखें पड़ीं, जिसके बाद आखिरकार न्याय की जीत हुई है। खून के बदले खून की यह खौफनाक दुश्मनी साल 2008 में बकरीद के मातमी जुलूस के दौरान शुरू हुई थी और इसका असर अगले साल यानी 2009 में शरीफ सेठ के भाई नफीस की हत्या तक पहुंच गया था। पुलिस की ओर से दाखिल की गई चार्जशीट में पूरी घटना का क्रम और परिस्थितियां इतनी स्पष्ट थीं कि कोर्ट ने घटनाक्रम और मजबूत वैज्ञानिक व परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को ही अपने फैसले का मुख्य आधार माना। इस पूरे मामले में दिलचस्प और खास बात यह रही कि इसी वर्ष फरवरी में नफीस हत्याकांड में जिन दो चश्मदीद गवाहों (मोबीन और असगर) को दोषी करार देकर जेल भेजा गया था, उन्हीं की गवाही के आधार पर अब अदालत ने दूसरे पक्ष के शरीफ सेठ समेत 14 लोगों को उम्रकैद की सजा सुना दी है।
जानिए क्या था साल 2008 का वह खूनी घटनाक्रम
सरकारी वकील (डीजीसी) के मुताबिक, यह पूरा विवाद पट्टीशाह गांव के तत्कालीन प्रधान व बसपा नेता मजहर हैदर नकवी उर्फ मज्जू मियां, उनके बेटे रियाज हैदर नकवी और अंगरक्षक शमशाद से जुड़ा हुआ है। 7 दिसंबर 2008 को मज्जू मियां अपने बेटे और अंगरक्षक के साथ गांव में बकरीद के आठवीं के मातमी जुलूस में शामिल होने गए थे। जैसे ही यह जुलूस दूसरे पक्ष के साबिर अली के दरवाजे के सामने पहुंचा, वहां पहले से घात लगाकर बैठे अभियुक्तों ने जुलूस पर अचानक लाठी-डंडों से मारपीट और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। इस अंधाधुंध गोलीबारी में मज्जू मियां के बेटे रियाज हैदर नकवी की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई, जबकि मज्जू मियां और उनके सुरक्षाकर्मी शमशाद गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में इलाज के दौरान शमशाद ने भी दम तोड़ दिया था।
इन 14 दोषियों को कोर्ट ने भेजा सलाखों के पीछे
अदालत ने जिन 14 आरोपियों को हत्या, बलवा और जानलेवा हमले का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है, उनमें पट्टीशाह गांव के तीन सगे भाई शरीफ सेठ, रईस और शफीक शामिल हैं। इनके अलावा मोईन उर्फ मुर्रा, रईश, सगीर, सुल्तानपुर घोष क्षेत्र के निहालउद्दीन उर्फ नेहाल, इसराइल, खरकी का पुरवा निवासी अशोक, पट्टीशाह के तीन अन्य भाई साबिर अली, सादिक अली, वाजिद अली, संजय शुक्ला और हथगाम के अखरी गांव निवासी सुरेश सिंह उर्फ मुन्नू सिंह शामिल हैं। बता दें कि इनमें से कई दोषियों को कोर्ट ने बलवा और मारपीट से जुड़ी अन्य धाराओं में भी तीन-तीन वर्ष की सजा सुनाई है।
मुन्नू सिंह की बढ़ीं मुश्किलें और मज्जू मियां का दर्द
इस फैसले के बाद दोषियों में शामिल सुरेश उर्फ मुन्नू सिंह की कानूनी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ने वाली हैं, क्योंकि वह पहले से ही हथगाम के चर्चित अखरी तिहरे हत्याकांड (जिसमें एक किसान नेता समेत तीन लोगों की हत्या हुई थी) का मुख्य आरोपी है और उसके खिलाफ अन्य कई मुकदमे भी दर्ज हैं। दूसरी तरफ, साल 2008 के इस हमले में गोलियां लगने के बाद पूर्व प्रधान मज्जू मियां पूरी तरह पैरालाइज (पंगु) हो गए थे। खराब स्वास्थ्य के चलते वे जीवनभर अपने ही बेटे की हत्या के मुकदमे में अदालत के सामने गवाही नहीं दे सके और इसी मलाल के साथ इलाज के दौरान साल 2012 में उनका निधन हो गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह भी साफ हुआ था कि मज्जू मियां और उनके साथियों को बेहद नजदीक से गोलियां मारी गई थीं, जो शरीर के आर-पार हो गई थीं।
अदालती आंकड़ों में दोनों पक्षों का हिसाब
विवाद की शुरुआत से लेकर अब तक दोनों पक्षों की ओर से दर्ज मुकदमों में कुल 41 आरोपी नामजद किए गए थे, जिनमें से 33 को अदालत अब तक दोषी ठहरा चुकी है, जबकि शेष आरोपियों की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है। साल 2009 के क्रॉस केस में कुल 25 अभियुक्तों में से मज्जू मियां, शरीफ, अमीन, कमल सिंह, नसीम और सगीर की मौत हो चुकी है, जबकि बाकी के आरोपी या तो जेल में निरुद्ध हैं या फिर जमानत पर हैं। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद पुलिस प्रशासन ने क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया है।