KNEWS DESK- भारत में NEET-UG परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगाए जाने की खबर के बाद बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या कोई ऐप सरकार के इस तरह के आदेश को अदालत में चुनौती दे सकता है। इसी बीच टेलीग्राम के CEO की ओर से भी कई आरोप सामने आए हैं, जिससे यह मामला और चर्चा में आ गया है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में कोई भी ऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म सरकार के ब्लॉकिंग आदेश को कोर्ट में चुनौती दे सकता है। इतना ही नहीं, यूजर्स भी अपने अधिकारों के उल्लंघन का मामला अदालत में उठा सकते हैं। अदालत ऐसे मामलों में दोनों पक्षों की दलीलें सुनती है और यह तय करती है कि सरकार का आदेश कानून के अनुसार, जरूरी और संतुलित है या नहीं।
भारत में किसी भी वेबसाइट या ऐप को ब्लॉक करने का मुख्य कानून सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) है। इसकी धारा 69A के तहत सरकार को यह अधिकार मिलता है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, अपराध रोकने या परीक्षा जैसी स्थितियों में किसी प्लेटफॉर्म को ब्लॉक कर सकती है।
इसके अलावा IT Rules 2009 के तहत पूरी ब्लॉकिंग प्रक्रिया तय की गई है। इसमें जांच, इंटर-मिनिस्ट्रियल कमेटी की समीक्षा और IT सचिव की मंजूरी शामिल होती है। गंभीर मामलों में सरकार अस्थायी (इमरजेंसी) ब्लॉकिंग भी कर सकती है, जिसे बाद में समीक्षा के अधीन रखा जाता है।
हालांकि कानून में यह भी साफ है कि सरकार को “प्रोपोर्शनैलिटी” यानी संतुलन का ध्यान रखना जरूरी है। अगर समस्या कुछ चैनलों तक सीमित है तो पूरे ऐप को बंद करना अंतिम विकल्प होना चाहिए।
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है, खासकर जब मामला सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा हो।
सुप्रीम कोर्ट ने भी श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि धारा 69A संवैधानिक है, लेकिन इसका उपयोग मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता।
नीट-यूजी जैसे मामलों में सरकार का तर्क यह हो सकता है कि परीक्षा की निष्पक्षता और पेपर लीक रोकने के लिए अस्थायी रोक जरूरी थी। वहीं दूसरी तरफ डिजिटल स्वतंत्रता और यूजर्स के अधिकारों पर असर को लेकर सवाल उठते रहेंगे।
इस तरह यह मामला डिजिटल सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का एक अहम उदाहरण बन जाता है।