KNEWS DESK – Supreme Court of India में Sabarimala Temple सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और उनसे जुड़े भेदभाव के मामलों पर सुनवाई जारी है। इस दौरान कोर्ट ने सुनवाई के मुख्य मुद्दे से भटकने पर एक वकील को कड़ी फटकार लगाई। मामला महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन से जुड़ा है, जिस पर नौ जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है।
सबरीमाला मामले पर जारी है सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री पर धार्मिक परंपराओं के सम्मान की दलील दी थी। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश भी प्रतिबंधित है, इसलिए केवल महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे को अलग तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान यह भी बहस हो रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
वकील को कोर्ट ने कई बार रोका
मंगलवार को सुनवाई के दौरान एडवोकेट Ashwini Upadhyay ने अपनी दलीलों में कई ऐसे मुद्दे उठाए, जो सीधे तौर पर सबरीमाला मामले से जुड़े नहीं थे। उन्होंने धर्म, संविधान, संस्कृत भाषा और भारत के विभाजन जैसे विषयों पर लंबी बहस शुरू कर दी।
उन्होंने कहा कि धर्म पंथ से श्रेष्ठ है और पिछले 2000 वर्षों में सांप्रदायिक संघर्षों के कारण भारत कई हिस्सों में बंट गया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगले 25 वर्षों में भारत चीन, जापान और सिंगापुर जैसा वैज्ञानिक रूप से एकीकृत देश बनेगा या पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसी स्थिति में जाएगा।
कोर्ट ने कई बार उन्हें कहा कि वे केवल विचाराधीन मुद्दों तक ही सीमित रहें।
डॉ. अंबेडकर और संस्कृत का भी किया जिक्र
बहस के दौरान अश्विनी उपाध्याय ने यह भी दावा किया कि संस्कृत में अंग्रेजी से अधिक अक्षर हैं और B. R. Ambedkar ने संस्कृत को राजभाषा बनाने के लिए विधेयक पेश किया था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी में “संविधान” और “धर्म” जैसे शब्दों के लिए सटीक शब्द नहीं हैं, क्योंकि अंग्रेजी भाषा सीमित है।
उन्होंने यह भी कहा कि प्राथमिक शिक्षा में धर्म को शामिल किया जाना चाहिए और इस विषय पर उन्होंने जनहित याचिका भी दायर की है।
जस्टिस महादेवन ने जताई नाराजगी
जब बहस लगातार मूल मुद्दे से भटकती गई, तब न्यायमूर्ति Justice Mahadevan ने स्पष्ट नाराजगी जताई। उन्होंने कहा,
“आप हम सभी के द्वारा चर्चा किए जा रहे विषय से भटक रहे हैं। आपने कहा कि संस्कृत में 52 अक्षर हैं; इसी प्रकार तमिल में 247 अक्षर हैं। इन सब विषयों में न जाएं। मुद्दे पर ही ध्यान केंद्रित करें।”
कोर्ट की इस टिप्पणी को वकील को फटकार के रूप में देखा जा रहा है। पीठ ने साफ संकेत दिया कि संवेदनशील संवैधानिक मामलों में बहस तथ्यों और कानूनी मुद्दों तक सीमित रहनी चाहिए।