डिजिटल डेस्क- संसद में महिला आरक्षण को लेकर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। लंबे समय से चर्चा में रहे महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में पारित नहीं किया जा सका। इस बिल के गिरने के बाद जहां विपक्षी दल इसे अपनी बड़ी जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं। वहीं सत्तापक्ष में इसे लेकर तीखी नाराजगी देखने को मिल रही है। इस पूरे घटनाक्रम पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान भी सामने आया है। जिसमें उन्होंने विपक्ष पर महिलाओं के साथ “धोखा” करने का आरोप लगाया है। अमित शाह ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा। “देश की आधी आबादी, 70 करोड़ महिलाओं को धोखा देने और उनका विश्वास खोने के बाद कोई कैसे विजय का जश्न मना सकता है?” उन्होंने विपक्ष के जश्न को महिलाओं का अपमान बताया। और कहा कि यह उन सभी महिलाओं के संघर्ष का मजाक है। जो दशकों से अपने अधिकारों के लिए इंतजार कर रही हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगी आखिर कितनी बार महिलाओं के साथ विश्वासघात करेंगे।
कांग्रेस, टीएमसी, सपा समेत कई राजनीतिक पार्टियों को लिया निशाने पर
गृह मंत्री ने एक अन्य पोस्ट में विपक्षी दलों कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा। कि इन दलों ने “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” को पारित नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले इस ऐतिहासिक विधेयक को खारिज करना। और उस पर जश्न मनाना निंदनीय ही नहीं। बल्कि अकल्पनीय भी है। शाह ने चेतावनी भरे लहजे में कहा। कि “नारी शक्ति के अपमान की यह बात दूर तक जाएगी”। और विपक्ष को आने वाले चुनावों में इसका जवाब मिलेगा। दरअसल, शुक्रवार 17 अप्रैल को लोकसभा में इस महत्वपूर्ण विधेयक पर करीब 21 घंटे तक विस्तृत चर्चा हुई। इसके बाद जब मतदान हुआ। तो कुल 528 सांसदों ने वोट डाले। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े। जबकि विरोध में 230 वोट डाले गए।
बहुमत के आंकड़े को नहीं छू पाया बिल
हालांकि, संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इस गणना के अनुसार 352 वोट जरूरी थे। लेकिन सरकार यह आंकड़ा हासिल नहीं कर पाई। और बिल 54 वोट से गिर गया। इस विधेयक में महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान था। साथ ही, संसद की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव भी इसमें शामिल था। इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा था। वहीं, विपक्ष का कहना है कि सरकार इस बिल को सही तरीके से पेश करने और व्यापक सहमति बनाने में विफल रही। विपक्षी दलों ने इसे अपनी रणनीतिक जीत बताते हुए कहा। कि वे महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में हैं। लेकिन सरकार का तरीका और समय सही नहीं था।