KNEWS DESK- पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुई बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता का पहला दौर समाप्त हो गया है। यह वार्ता पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और लंबे समय से चले आ रहे टकराव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। हालांकि शुरुआती बातचीत में कुछ तीखे मतभेद भी सामने आए, जिससे आगे की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है।
इस उच्चस्तरीय बैठक में ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान अराघची ने किया, जबकि अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे थे। बातचीत के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस भी हुई, जिसने वार्ता के माहौल को कुछ समय के लिए तनावपूर्ण बना दिया।
यह ऐतिहासिक वार्ता 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच पहली प्रत्यक्ष और उच्चस्तरीय बातचीत मानी जा रही है। पाकिस्तान ने इस संवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है, जहां प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दोनों प्रतिनिधिमंडलों से अलग-अलग मुलाकात कर बातचीत को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।इसी बीच, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बयान ने इस शांति प्रक्रिया पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजराइल ईरान और उसके सहयोगियों के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगा।
सोशल मीडिया मंच X पर जारी बयान में उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की आलोचना करते हुए उन पर आतंकवाद को समर्थन देने और अपने ही नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करने का आरोप लगाया।नेतन्याहू ने अपने एक वीडियो संदेश में दावा किया कि इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। उनके अनुसार, ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के बेहद करीब था और मिसाइल उत्पादन की क्षमता तेजी से बढ़ा रहा था। उन्होंने कहा कि यह अभियान अभी समाप्त नहीं हुआ है और इजराइल भविष्य में भी आवश्यक कदम उठाता रहेगा।उधर, वार्ता में शामिल ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया कि बातचीत अब विशेषज्ञ स्तर तक पहुंच चुकी है। इसमें आर्थिक, सैन्य, कानूनी और परमाणु मामलों से जुड़ी समितियां भी शामिल हो गई हैं, जो तकनीकी पहलुओं को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। हालांकि अभी किसी ठोस समझौते की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन दोनों पक्षों ने बातचीत जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़े असर को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है। आने वाले दौर की बातचीत यह तय करेगी कि क्या दशकों पुराने इस तनावपूर्ण रिश्ते में कोई वास्तविक सुधार संभव है या नहीं।