शिव शंकर सविता- उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित लोक निर्माण विभाग (PWD) के एसी मुखर्जी ब्लॉक में मंगलवार सुबह एक भीषण आग लगने की घटना से हड़कंप मच गया। मुख्यालय के कार्यालय कक्ष एक के बगल में अचानक आग की लपटें उठने से वहां मौजूद कर्मचारियों में अफरा-तफरी मच गई। हालांकि, आग पर काबू पा लिया गया, लेकिन इससे हुई क्षति ने विभागीय लापरवाही और भ्रष्टाचार की पोल खोलकर रख दी है। इस आगजनी में प्रदेश स्तरीय मार्गों और नव निर्मित सड़कों से जुड़े अहम दस्तावेज जलकर खाक हो गए हैं, जिससे विभाग को भारी आर्थिक और सूचनात्मक नुकसान उठाना पड़ सकता है। सुबह के समय हुई इस घटना ने सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आग लगने की वजह से कई महत्वपूर्ण अभिलेख, फाइलें, आगणन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जलकर राख हो गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अधिकारी अभी तक यह बताने से बच रहे हैं कि आग से आखिर क्या-क्या नुकसान हुआ है। सूत्रों की मानें तो आग से कई ऐसी फाइलें नष्ट हुई हैं जिनमें सड़क निर्माण के ठेके और वित्तीय विवरण दर्ज थे।
आग लगने की वजह शॉर्ट सर्किट बताई जा रही
मिली जानकारी के अनुसार, इस घटना के पीछे मुख्य वजह बदहाल बिजली व्यवस्था बताई जा रही है। मुख्यालय के कार्यालयों में आज भी 50 वर्ष पुरानी वायरिंग का इस्तेमाल हो रहा है। इस क्षेत्र का चार्ज अवर अभियंता हरि सिंह और राम धनी मौर्य के पास था। आरोप है कि कई बार इसकी मरम्मत के लिए एस्टीमेट बनने के बावजूद वायरिंग को नहीं बदला गया, जिससे शॉर्ट सर्किट की आशंका बनी रही। विभाग में रेनोवेशन (नवीनीकरण) के नाम पर हो रही खर्चबाजी पर भी सवाल उठ रहे हैं। अधीक्षण अभियंता अभय गुप्ता के पास रेनोवेशन और कार्ययोजना का चार्ज है। मुख्य अभियंता विद्युत यांत्रिक यूके सिंह पर अधिकारी अशोक कनोजिया ने आरोप लगाए थे, लेकिन बाद में उन्होंने भी चुप्पी साध ली।
रेनोवेशन के नाम पर करोड़ों रूपए हो चुके स्वाहा
सूत्रों का कहना है कि पहले से रेनोवेट हो चुके कमरों का बार-बार रेनोवेशन कराया जा रहा है। रेनोवेशन के नाम पर पहले भी करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं जैसे सुरक्षित बिजली वायरिंग पर ध्यान नहीं दिया गया। प्रमुख अभियंता परिकल्प द्वारा भी अपने कमरे को दोबारा रेनोवेट कराया गया, जबकि उस कमरे की हालत ठीक थी। यह पूरा मामला करोड़ों रुपए खर्च के बावजूद सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलता है। अब सवाल यह उठ रहे हैं कि आखिर रेनोवेशन के नाम पर इतना पैसा कहां खर्च हो रहा है और जब दस्तावेज सुरक्षित नहीं रह सकते, तो यह रेनोवेशन किसके फायदे के लिए हो रहा है? अब देखना यह है कि क्या इस मामले में लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा।