शिव शंकर सविता- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने शिवपुरी जिला प्रशासन द्वारा की गई एक बड़ी भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह से अवैध करार देते हुए निरस्त कर दिया है। यह फैसला उन उम्मीदवारों के लिए राहत भरा साबित हुआ है, जो लंबे समय से प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि जिला प्रशासन द्वारा राज्य सरकार के दिशा-निर्देशों की अनदेखी करके भर्ती के नियमों में किया गया बदलाव गलत और असंवैधानिक था। यह मामला वर्ष 2014 का है, जब शिवपुरी प्रशासन ने ऑफिस असिस्टेंट और डेटा एंट्री ऑपरेटर के पदों पर बड़े स्तर पर भर्तियां की थीं। शिकायतकर्ता योगेश कुमार कुशवाह ने वर्ष 2015 में इस भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देते हुए याचिका (WP No 464/2015) दायर की थी। लगभग 10 से 11 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अब न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया है।
कलेक्टर द्वारा नियमों के बदलाव को ठहराया गलत
कोर्ट के फैसले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तत्कालीन कलेक्टर और अपर कलेक्टर द्वारा किए गए नियमों में बदलाव को गलत ठहराया गया है। दरअसल, साल 2011 के एक सरकारी सर्कुलर के मुताबिक, इन पदों पर भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक निर्धारित की गई थी। इतना ही नहीं, चयन प्रक्रिया का आधार केवल मेरिट (स्नातक में प्राप्त अंक) होना था, जिसमें विज्ञान संकाय के स्नातकों को वरीयता देने का प्रावधान था। लेकिन शिवपुरी प्रशासन ने विज्ञापन जारी करते समय इन नियमों के साथ खेल कर दिया।
मनमाने तरीके से 60 प्रतिशत के साथ स्नातक योग्यता को किया था अनिवार्य
प्रशासन ने मनमाने ढंग से स्नातक में 60 प्रतिशत अंक होने की अनिवार्य शर्त लागू कर दी, जबकि मूल सरकारी आदेश में ऐसी कोई बाध्यकारी शर्त नहीं थी। इससे कई योग्य उम्मीदवारों के आवेदन करने का रास्ता बंद हो गया। इसके अलावा, सरकार ने जहां विज्ञान विषय के छात्रों को प्राथमिकता दी थी, वहीं प्रशासन ने किसी भी स्ट्रीम (कला, वाणिज्य या विज्ञान) के उम्मीदवारों को आवेदन की अनुमति देकर विज्ञान स्नातकों को मिलने वाली वरीयता को खत्म कर दिया। यह राज्य सरकार की स्पष्ट नीति के विपरीत था। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आनंद सिंह बहरावत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि कलेक्टर या जिला प्रशासन राज्य सरकार की बाध्यकारी शर्तों और दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। अपनी मर्जी से नियमों में बदलाव करना और योग्यता की सीमा तय करना उनके अधिकार के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने इस पूरे प्रक्रिया को ‘नॉन-एप्लीकेशन ऑफ माइंड’ (बुद्धि का गैर-प्रयोग) करार दिया और स्पष्ट किया कि ऐसी मनमानी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।