शिव शंकर सविता- “दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।” यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने का अडिग संकल्प था। महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि 27 फरवरी को देश उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। उनका जीवन साहस, स्वाभिमान और बलिदान की ऐसी गाथा है, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा में जन्मे चंद्रशेखर तिवारी के भीतर बचपन से ही स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित थी। कहा जाता है कि किशोरावस्था में ही उन्होंने अंग्रेजी अत्याचार के विरोध में एक अंग्रेज अफसर पर पत्थर फेंका था। महज 14 वर्ष की आयु में वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। गिरफ्तारी के बाद जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने निर्भीकता से कहा नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘आजादी’ और पता ‘जेलखाना’। उम्र कम होने के कारण उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई, लेकिन हर कोड़े पर उनके होंठों से “भारत माता की जय” का नारा गूंजता रहा। यहीं से चंद्रशेखर तिवारी, चंद्रशेखर आजाद बन गए।
साथियों संग मिलकर बनाई HSRA और लिया अंग्रेजों से लोहा
इतिहासकारों के अनुसार, चौरी-चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया, तो इसने आजाद जैसे युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। उन्हें लगा कि अहिंसा से अंग्रेजी हुकूमत पर अपेक्षित असर नहीं पड़ेगा। यही वह मोड़ था, जब उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना। उनका मानना था कि “अगर आपके लहू में रोष नहीं है, तो वह पानी है जो आपकी रगों में बह रहा है।” क्रांतिकारी विचारों से ओतप्रोत आजाद बहुत जल्द युवाओं के प्रेरणास्रोत बन गए। उन्होंने भगत सिंह और अन्य साथियों के साथ मिलकर HSRA को सशक्त रूप दिया। इससे पहले हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के गठन का उद्देश्य क्रांतिकारी तरीकों से गणतांत्रिक भारत की स्थापना करना था। आजाद संगठन के रणनीतिकार थे वे योजनाएं बनाते, युवाओं को जोड़ते और अंग्रेजों को चकमा देते रहते।
काकोरी कांड के बाद धरपकड़ में अंग्रेजों को दिया था चकमा
‘काकोरी कांड’ के बाद जब अंग्रेजों ने व्यापक धरपकड़ शुरू की, तब भी आजाद पुलिस के हाथ नहीं आए। उनकी चपलता और सूझबूझ ने ब्रिटिश हुकूमत को परेशान कर रखा था। उनका प्रण स्पष्ट था अंग्रेज उन्हें कभी जिंदा नहीं पकड़ पाएंगे। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क जिसे आज चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है में मुखबिरी के आधार पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई। इतिहासकारों का कहना है कि अंग्रेजों ने अक्सर गद्दारी के सहारे ही जीत हासिल की। उसी मुखबिरी के चलते आजाद घिरे। जब उन्हें एहसास हुआ कि बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है और साथी सुरक्षित निकल चुके हैं, तो उन्होंने अपने प्रण को निभाया। अंतिम गोली खुद को मारकर वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया।
केवल क्रांतिकारी ही नहीं आत्मसम्मान की जीवित मिसाल थे आजाद
आजाद केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की जीवित मिसाल थे। उनकी पंक्तियां “चिंगारी आजादी की सुलगी मेरे जश्न में है, इंकलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में हैं…” आज भी युवाओं के भीतर देशभक्ति की आग प्रज्वलित करती हैं। उनका जीवन बताता है कि स्वतंत्रता केवल शब्द नहीं, बल्कि त्याग और तपस्या का परिणाम है। आज, जब हम स्वतंत्र भारत की हवा में सांस लेते हैं, तो उसमें उन मतवालों की महक शामिल है, जिन्होंने अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित कर दिया। चंद्रशेखर आजाद का नाम उन अमर शहीदों में सबसे उज्ज्वल है, जिनकी वीरता और बलिदान ने इतिहास की धारा मोड़ दी।