Knews Desk– देशभर में पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि ऐसे मामलों की सुनवाई अब फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराई जाएगी। सरकार का उद्देश्य है कि परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ करने वाले दोषियों को जल्द से जल्द सजा मिले और युवाओं का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत हो। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या होती है, यह कैसे काम करती है और किन मामलों की सुनवाई करती है?फास्ट ट्रैक कोर्ट ऐसी विशेष अदालतें होती हैं, जिनका मकसद गंभीर और संवेदनशील मामलों का सामान्य अदालतों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से निपटारा करना है। इन अदालतों की शुरुआत वर्ष 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर हुई थी। शुरुआत में इनका उद्देश्य जिला और अधीनस्थ अदालतों में वर्षों से लंबित मामलों का तेजी से निपटान करना था। बाद में 2011 में यह योजना समाप्त हो गई, लेकिन समय-समय पर राज्यों ने अपनी जरूरत के अनुसार इन्हें जारी रखा।
साल 2012 के निर्भया कांड के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट एक बार फिर चर्चा में आए। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की त्वरित सुनवाई के लिए दिल्ली समेत कई राज्यों में विशेष अदालतें बनाई गईं। इसके बाद केंद्र सरकार ने 2019 में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना लागू की, जिसका मुख्य उद्देश्य रेप और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम से जुड़े मामलों का शीघ्र निपटारा करना था।सरकार के अनुसार, देश में 30 जून 2025 तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 725 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट स्थापित किए जा चुके हैं। इनमें 392 एक्सक्लूसिव पॉक्सो कोर्ट हैं, जो केवल बच्चों के यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई करती हैं। अब तक इन अदालतों में 3.34 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया जा चुका है। सरकार का दावा है कि जहां सामान्य अदालतों में एक कोर्ट औसतन हर महीने लगभग 3 मामलों का निपटारा करती है, वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट में यह औसत करीब 9 से 10 मामलों तक पहुंच जाता है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में आमतौर पर बलात्कार, पॉक्सो एक्ट, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराध, हत्या जैसे जघन्य मामलों तथा सरकार या हाईकोर्ट द्वारा चिन्हित अन्य संवेदनशील मामलों की सुनवाई की जाती है। अब सरकार पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों को भी इसी श्रेणी में लाकर उनकी सुनवाई तेज करना चाहती है। इसका उद्देश्य केवल दोषियों को सजा देना नहीं, बल्कि भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता बनाए रखना भी है।हाल के वर्षों में कई मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने रिकॉर्ड समय में फैसला सुनाया है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में छह महीने के बच्चे से दुष्कर्म के मामले में आरोपी को महज 24 दिनों में आजीवन कारावास की सजा मिली। मध्य प्रदेश के इटारसी में नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में 21 दिनों के भीतर फैसला सुनाया गया। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि मजबूत जांच और पर्याप्त साक्ष्य होने पर फास्ट ट्रैक कोर्ट बेहद कम समय में फैसला दे सकती हैं।
हालांकि, फास्ट ट्रैक कोर्ट कोई अलग न्यायिक व्यवस्था नहीं हैं। इनमें भी वही कानून लागू होते हैं जो सामान्य अदालतों में होते हैं और इनके फैसलों को उच्च अदालतों में चुनौती दी जा सकती है। यदि जिला स्तर की फास्ट ट्रैक कोर्ट फैसला सुनाती है तो उसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है, जबकि हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।पेपर लीक मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने का फैसला लाखों अभ्यर्थियों के लिए अहम माना जा रहा है। यदि जांच एजेंसियां समय पर चार्जशीट दाखिल करती हैं और पर्याप्त सबूत पेश करती हैं, तो ऐसे मामलों में भी जल्दी फैसला आने की संभावना बढ़ेगी। इससे न केवल दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी, बल्कि भर्ती और परीक्षा प्रणाली में लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।