भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए सीमाओं की सुरक्षा के साथ नागरिकों, उद्योग, शिक्षण संस्थानों और युवाओं की भागीदारी भी जरूरी है। मेजर जनरल गंभीर सिंह ने रक्षा और आंतरिक सुरक्षा पर आयोजित एक संगोष्ठी में इस बात पर जोर दिया।
Knews Desk– मेजर जनरल गंभीर सिंह ने गुरुवार को कहा कि देश की संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत को अपनी सीमा सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि रक्षा व्यवस्था की एक मजबूत दूसरी पंक्ति तैयार करना भी जरूरी है, जिसमें नागरिक सुरक्षा, पुलिस बल और स्थानीय समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
टेरिटोरियल आर्मी की ओर से रक्षा और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए गंभीर सिंह ने कहा कि किसी भी देश की प्राथमिक जिम्मेदारी अपने क्षेत्र और सीमाओं की रक्षा करना है। सेना को मौजूदा और संभावित खतरों से निपटने के लिए हर जरूरी कदम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रभावी सीमा सुरक्षा केवल किसी एक राज्य या क्षेत्र की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध पूरे देश की सुरक्षा, स्थिरता और सामाजिक-आर्थिक विकास से है। मजबूत सीमाएं देश को बाहरी खतरों से बचाने के साथ विकास के लिए सुरक्षित माहौल भी उपलब्ध कराती हैं।
मेजर जनरल गंभीर सिंह ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय रक्षा की जिम्मेदारी केवल सशस्त्र बलों तक सीमित नहीं हो सकती। लंबे समय तक देश की सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत बनाए रखने के लिए उद्योग, शिक्षण संस्थानों और युवाओं को भी रक्षा क्षेत्र के साथ मिलकर काम करना होगा।
उन्होंने रक्षा की दूसरी पंक्ति को मजबूत करने के लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों की भूमिका बताई। उनके मुताबिक उद्योग आधुनिक तकनीक, स्वदेशी उत्पादन और लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध करा सकता है। एकेडेमिया रिसर्च, इनोवेशन और विशेषज्ञ प्रशिक्षण को बढ़ावा दे सकता है, जबकि युवा नई सोच, ऊर्जा और भविष्य के नेतृत्व को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दे सकते हैं।
गंभीर सिंह ने कहा कि सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार जटिल होती जा रही हैं। ऐसे में समाज के अलग-अलग वर्गों की भागीदारी से इन चुनौतियों का सामना ज्यादा प्रभावी तरीके से किया जा सकता है। इससे रक्षा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को भी लंबे समय तक गति मिल सकती है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नागरिक तैयारी, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और स्वदेशी रक्षा तकनीक जैसी क्षमताओं को मजबूत नहीं किया गया, तो लंबे समय तक चलने वाले या एक साथ कई मोर्चों पर उत्पन्न होने वाले संकटों में सशस्त्र बलों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
संगोष्ठी में शामिल नीति विशेषज्ञों ने भी इस विचार का समर्थन किया। कार्यक्रम में निजी उद्योग के साथ रक्षा अनुसंधान एवं विकास साझेदारी बढ़ाने, विश्वविद्यालयों में रक्षा संबंधी प्रयोगशालाओं का विस्तार करने, युवाओं के लिए कैडेट और नागरिक सुरक्षा कार्यक्रम शुरू करने तथा राज्यों की आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत करने जैसे सुझाव सामने आए।
गंभीर सिंह ने अंत में सामूहिक प्रयासों की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि जब देश के विभिन्न वर्ग एकजुट होकर काम करते हैं, तो भारत अपनी सुरक्षा क्षमताओं और सामरिक प्रभाव को और बेहतर तरीके से मजबूत कर सकता है। उन्होंने कहा कि सीमाओं की सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए पूरे समाज की भागीदारी जरूरी है।