KNEWS DESK- सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि बुजुर्ग माता-पिता जरूरत पड़ने पर अपने बच्चों और बहू-बेटे को अपनी संपत्ति से बेदखल करा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब असुरक्षा, अपमान या परेशानी सहना नहीं है। हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना कानून का प्रमुख उद्देश्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। यह मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता से जुड़ा है। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनके बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के आदेश को रद्द कर दिया गया था।
मामले के मुताबिक, रवि कांत गुप्ता की 81 वर्षीय मां को कथित तौर पर जबरन वृद्धाश्रम भेज दिया गया था। इसके बाद उन्होंने 5 जून 2022 को माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत जिला प्रशासन से अपने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने की मांग की। उप-विभागीय मजिस्ट्रेट ने पाया कि संबंधित मकान रवि कांत गुप्ता की स्व-अर्जित संपत्ति है। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि उनके बेटे ने अपनी दादी को घर में रहने की अनुमति नहीं दी और कथित तौर पर उनके साथ उपद्रव किया। इसके बाद 15 नवंबर 2022 को बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दिया गया। जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को भी इस आदेश को बरकरार रखा और बेटे-बहू को मकान का कब्जा वापस करने का निर्देश दिया।
बेटे और बहू ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने अधिकारियों के बेदखली आदेश को रद्द करते हुए कहा था कि संबंधित कानून के तहत अधिकारियों को इस तरह का आदेश देने का अधिकार नहीं है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण के लिए गठित ट्रिब्यूनल के पास परिस्थितियों के अनुसार बच्चों को संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार है। कोर्ट ने साफ किया कि कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देना है।