निर्जला एकादशी पर किन परिस्थितियों में पी सकते हैं पानी? जानें व्रत के नियम और धार्मिक मान्यता

KNEWS DESK- ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर रखा जाने वाला निर्जला एकादशी व्रत हिंदू धर्म के सबसे कठिन और पुण्यदायी व्रतों में से एक माना जाता है। इस व्रत में श्रद्धालु पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर भगवान विष्णु की उपासना करते हैं। मान्यता है कि इस एक व्रत को करने से वर्षभर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। इस कारण इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

क्यों खास है निर्जला एकादशी?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडु पुत्र भीम सभी एकादशी व्रत नहीं कर पाते थे। तब महर्षि व्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जला व्रत रखने की सलाह दी। तभी से इस व्रत को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्रदान करता है और मृत्यु के बाद मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

इस वर्ष निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून को रखा जाएगा।

क्या निर्जला एकादशी में पानी पी सकते हैं?

निर्जला एकादशी का मूल संकल्प जल का त्याग करना होता है। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में इस व्रत के दौरान पानी पीना वर्जित माना जाता है। हालांकि, धर्म शास्त्रों और विभिन्न धार्मिक परंपराओं में कुछ विशेष परिस्थितियों में जल ग्रहण करने की अनुमति बताई गई है।

सेहत बिगड़ने पर ले सकते हैं जल

यदि व्रत के दौरान किसी व्यक्ति की तबीयत अचानक खराब हो जाए, अत्यधिक कमजोरी महसूस होने लगे या स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने लगे, तो ऐसी स्थिति में जल ग्रहण किया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरीर की रक्षा करना भी धर्म का ही एक हिस्सा माना गया है। इसलिए आपातकालीन स्थिति में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।

अत्यधिक कमजोरी होने पर क्या करें?

अगर व्रती को चक्कर आना, अत्यधिक थकान या कमजोरी महसूस हो रही हो, तो भगवान विष्णु का स्मरण कर जल ग्रहण किया जा सकता है। कुछ परंपराओं में यह भी माना जाता है कि यदि व्रत पूरा करना संभव न हो, तो सूर्यास्त के बाद जल ग्रहण कर भगवान से क्षमा प्रार्थना की जा सकती है।

किन लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निम्नलिखित लोग अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत का पालन कर सकते हैं—बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति, नियमित दवा लेने वाले लोग ऐसे लोग आवश्यकता पड़ने पर जल या फलाहार ग्रहण करते हुए भी भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा कर सकते हैं।

जल का त्याग क्या दर्शाता है?

निर्जला एकादशी में जल का त्याग केवल एक धार्मिक नियम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, अनुशासन और इच्छाओं पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है। यह व्रत व्यक्ति को धैर्य, संयम और मानसिक दृढ़ता की सीख देता है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

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