KNEWS DESK- पितृपक्ष में सप्तमी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन उन पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है, जिनका देहांत किसी भी महीने के शुक्ल या कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ हो। 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध किया जाएगा। ऐसे में जानिए इस दिन के शुभ मुहूर्त और तर्पण से लेकर पिंडदान तक की पूरी विधि।
पितृपक्ष का समय पितरों को समर्पित होता है। यह अवधि 16 दिनों की होती है और हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर सर्वपितृ अमावस्या तक रहती है। इस बार पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई है और इसका समापन 10 अक्टूबर को होगा। इस दौरान लोग अपने मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं। पितृ दोष से मुक्ति के लिए भी इस दौरान अलग-अलग उपाय किए जाते हैं।
पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि पर अलग-अलग पितरों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है। 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध है। मान्यता के अनुसार, जिन परिवारों में किसी पूर्वज का देहांत सप्तमी तिथि को हुआ हो, उनके निमित्त इस दिन श्राद्ध किया जाता है।
सप्तमी श्राद्ध के शुभ मुहूर्त
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक।
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:34 बजे से 01:21 बजे तक।
अपराह्न काल: दोपहर 01:21 बजे से 03:44 बजे तक।
सप्तमी तिथि प्रारंभ: 2 अक्टूबर को सुबह 10:15 बजे।
सप्तमी तिथि समाप्त: 3 अक्टूबर को सुबह 07:59 बजे।
सुबह की तैयारी और शुद्धि
सप्तमी श्राद्ध के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। संभव हो तो स्वच्छ सफेद या पीले रंग के वस्त्र पहनें। इसके बाद घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह साफ-सफाई करें। श्राद्ध से जुड़े अनुष्ठान आमतौर पर दोपहर के समय, अपराह्न काल या कुतुप मुहूर्त में किए जाते हैं।
तर्पण की विधि
तर्पण के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठने की परंपरा है, क्योंकि दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है। हाथ में कुशा घास, काले तिल, जौ और जल लें। इसके बाद अपने गोत्र और पूर्वजों का नाम लेते हुए उनका आह्वान करें। ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ मंत्र का उच्चारण करते हुए धीरे-धीरे अंगूठे की तरफ से जल भूमि पर अर्पित करें।
पिंडदान की विधि
पिंडदान के लिए पके हुए चावल, जौ का आटा, काले तिल और घी मिलाकर छोटे-छोटे पिंड तैयार किए जाते हैं। इन पिंडों को कुशा या पत्तल पर रखकर श्रद्धाभाव के साथ पूर्वजों को अर्पित करें।
पंचबलि भोग
ब्राह्मण को भोजन कराने या मुख्य भोजन से पहले भोजन का कुछ हिस्सा जीव-जंतुओं के लिए निकालने की परंपरा है। इसमें गाय के लिए गौ-ग्रास, कौवे के लिए काक-बलि तथा कुत्ते, चींटी और पक्षियों के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है। कौवे को पितरों का संदेशवाहक भी माना जाता है।
ब्राह्मण भोजन और दान
सप्तमी श्राद्ध के दिन किसी योग्य और विद्वान पंडित या ब्राह्मण को घर आमंत्रित कर आदरपूर्वक भोजन कराने की परंपरा है। आमतौर पर सात्विक भोजन में खीर, पूरी, दाल और सब्जी आदि शामिल किए जाते हैं। भोजन के बाद सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण को दक्षिणा, वस्त्र और फल देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
इसके अलावा सप्तमी श्राद्ध पर जरूरतमंदों को दान करने और भगवद्गीता का पाठ करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।