वन्य जीव हमला नहीं कम, राजनीति झमा झम !

उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में जंगली जानवरों का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है. बीते कुछ महीनों पहले देखा गया कि बाघ, गुलदार, भालू के हमलों से कई लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन खतरा अभी भी लगातार बना हुआ दिखाई दे रहा है. हालांकि वन विभाग और प्रशासन बड़े बड़े दावे तो करता हुआ दिखाई दे रहा है लेकिन अभी तक कोई परिणाम निकल कर सामने नही आया है. आपको बता दे की जहाँ एक ओर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रहे जंगली जानवरो के हमलों ने सभी क्षेत्रों में रह रहे लोगो की नींद उड़ा रखी है. वर्ष 2025 में वन्य जीवो के हमलों से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र राज्य के पौड़ी जिले को देखा गया था, जहाँ आये दिन वन्यजीवों के हमलों से आम लोग प्रभावित होते हुए दिखाई दिये थें. वही अब यह सिलसिला मैदानी इलाकों की ओर भी बढ़ता हुआ नज़र आने लगा है. आकड़ो की बात करे तो सन 2000 से लेकर अब तक 1265 लोगो की मौत और 6500 से अधिक लोग घायल जंगली जानवरो के हमलों से हुए है, पहाड़ी क्षेत्रों की बात करे तो गुलदार, भालू, बाघ के लोगो पर हमले तो वही मैदानी क्षेत्रों में हाथी, बंदरों द्वारा फसलों का नुक्सान देखा जा रहा है, सही मायने में कहा जाए तो प्रदेश में मानव-वन्य जीव संघर्ष थमने का नाम नही ले रहा है. बात इसी महीने के अंतराल की ही करे तो कुछ बड़ी दुखदाई घटनाएं देखने को मिली है, जिसमे पौड़ी के चौभट्टाखाल विधानसभा के ग्राम भतकोट मे चार वर्ष की बच्ची को तेंदुए द्वारा निवाला बना लिया गया, तो वही नैनीताल के भीमताल क्षेत्र में मवेशियों के लिए चारा लेने गई 55 वर्षीय महिला का गुलदार द्वारा शिकार बना लिया गया. ताज़ा मामला मंगलवार का है जब लैंसडाउन क्षेत्र में जंगल गई महिला पर भालू ने हमला कर दिया, जिससे महिला घायल हो गई. इन घटनाओं से भय का माहौल लोगों के बीच बना हुआ है, यही नही बात करे मैदानी इलाके लक्सर की तो हफ्ते भर पहले ग्रामीण क्षेत्र के बीच नदी में मगरमच्छ और देहरादून के विकासनगर में दिन दहाड़े गुर्जर बस्ती में अजगर के घुस आने से हड़कंप मच गया. साथ ही गर्मियों के दिन पूरी तरह से आने से पहले वनअग्नि की बढ़ती घटनाओं ने भी विषय को वन महकमे और आमजन के लिए चिंता का विषय बनाया हुआ है. कुलमिलाकर वन विभाग, शासन-प्रशासन पूरे प्रयास भी करता दिखाई दे रहा है, लेकिन अब तक कोई नतीजा राहत वाला सामने निकल कर नही आ रहा है. वही इस मामले ने राजनितिक तूल भी पकड़ लिया है, जिसके बाद विपक्ष द्वारा सरकार व प्रशासन की नीतियों पर सवाल खड़े कर रहा है. जिसके बाद आरोप प्रत्यारोप और राजनितिक गलियारों में बयानबाज़ी भी देखने को मिल रही है.

गढ़वाल और कुमाऊं में जंगली जानवरो के हमलों और वनाग्नि पर भी वन विभाग और सरकार ने अपनी चिंता जाहिर की है, हालाकि सरकार की ओर से हर सम्भव प्रयास करने का दावा तो पहले से ही किया जाता रहा है लेकिन इसका कोई धरातल पर बड़ा असर देखने को अभी तक नहीं मिला है आये दिन जंगली जानवरो की वजह से मौतों का आकड़ा बढ़ता नजर आ रहा , और सरकार का दवा फेल होता. इसी बीच वन मंत्री सुबोध उनियाल ने अधिकारियों के साथ बैठक कर अपनी चिंता तो जरूर जाहिर करी, लेकिन उसका कोई व्यापक असर दिखाई नहीं दे रहा है. वही इसी पुरे मामले पर विपक्ष ने सड़क से सदन तक सरकार को घेरने की रणनीति भी बनाई लेकिन वन महकमे के कानो पर इसकी जू तक नहीं रेंगी और आज भी प्रदेश में इन जंगली जानवरो के साथ आये दिन मानव को अपनी जान देकर सामना करने को मजबूर होना पड़ रहा है. इस साल के शुरुआती तीन महीनों में वन्यजीवों के 117 हमले हो चुके है.अगर पिछले साल यानी 2025 के आंकड़ों से तुलना करें तो स्थिति और भी चिंताजनक लगती है. साल 2025 में पूरे 12 महीनों के दौरान 68 लोगों की मौत वन्यजीव हमलों में हुई थी. जबकि 2026 में केवल तीन महीनों के भीतर ही 20 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. इस तुलना से साफ है कि इस साल घटनाओं की रफ्तार कहीं ज्यादा तेज है.

लगातार वन्य जीव मानव संघर्ष में टकराव की स्थिति देखने को मिल रही है. कुल मिलाकर नुकसान दोनों तरफ का हो रहा है.अब तो विपक्ष के पास भी ये मुद्दा सरकार को चेताने के लिए काफी है. लगातार प्रदेश भर में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी जारी है. लेकिन इस समस्या से निपटने का इलाज किसी के पास नहीं. सरकार सहित वन विभाग का पूरा सिस्टम अब तक मानव वन्यजीव संघर्ष पर फेल नजर आ रहा है. साथ ही अब वनाग्नि की समस्या भी गर्मी आने से पहले ही नजर आ रही है. सत्ता पक्ष सफाई देता नजर आ रहा है और आम जनता को आए दिन जंगली जानवरो के हमले से भी लड़ना पड़ रहा है. इस विषय के चलते प्रदेश के कई इलाकों में प्रदर्शन भी होते दिखाई दे रहे है और विपक्ष भी सरकार पर जमकर हल्ला बोलता नज़र आ रहा है.

प्रदेश में मानव वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है, जो बहुत बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है. वहीं अब पहाड़ों के बाद मैदानी क्षेत्रों में भी लगातार जंगली जानवरों का आतंक देखने को मिल रहा है. सवाल कुल मिलाकर अब यही है कि राज्य सरकार ने भी बढ़ते मानव वन्यजीव संघर्ष को लेकर अपने हाथ खड़े कर लिए है. ऐसे में पहाड़ की भौगोलिक परिस्तिथियों से गुजर रहे ग्रामीण क्या ऐसे ही मानव वन्यजीव संघर्ष करते रहेंगे. क्या हर साल वनाग्नि से भी प्रदेश के वन विभाग को करोडो का नुकसान हर साल यू ही झेलना पड़ेगा, तमाम प्रकार के जंगली जानवरो के हमलों की घटनाओ के मामलो ने सबकी नींद उड़ा रखी है, वही विपक्ष भी लगातार सरकार के सुरक्षा पैमानो पर सवाल खड़ा करता दिखाई दे रहा है, ऐसे में जल्द ही सरकार को बड़ा निर्णय लेना होगा, वरना साल दर साल वनाग्नि और वन्यजीव मानव संघर्ष से प्रदेश हर साल नुकसान से कई साल और पीछे चला जायेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *