देश में आरक्षण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। RSS प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान और सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के जवाब ने इस मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि SC, ST, OBC और EWS को मिलने वाले आरक्षण का आधार क्या है और क्या आरक्षित वर्गों के भीतर भी लाभार्थियों की प्राथमिकता तय की जानी चाहिए।
Knews Desk- देश में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में है। एक ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण का लाभ लेकर आगे बढ़ चुके लोगों से स्वेच्छा से पीछे हटने की बात कही है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने SC, ST, OBC और EWS आरक्षण के भीतर आय के आधार पर सब-कोटा तय करने की मांग का विरोध किया है।
इन घटनाक्रमों के बीच सोशल मीडिया पर भी आरक्षण व्यवस्था को लेकर पक्ष और विपक्ष में अभियान चल रहे हैं। ऐसे में यह सवाल फिर उठने लगा है कि आरक्षण का वास्तविक आधार क्या है और आने वाले समय में इसकी व्यवस्था में किसी तरह के बदलाव की गुंजाइश है या नहीं।
आरक्षण पर अचानक क्यों तेज हुई चर्चा?
आरक्षण को लेकर देश में लंबे समय से बहस होती रही है, लेकिन हाल की कुछ घटनाओं ने इसे दोबारा सुर्खियों में ला दिया है। सबसे पहले RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयान ने इस मुद्दे पर चर्चा बढ़ाई। भागवत ने कहा कि आरक्षण का लाभ लेकर सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुके लोगों को अपने ही समुदाय के दूसरे लोगों के लिए जगह छोड़ने पर विचार करना चाहिए।
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में आरक्षित वर्गों के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता या सब-कोटा निर्धारित करने से जुड़ा मामला सामने आया। केंद्र सरकार ने अदालत में इसका विरोध करते हुए कहा कि खासकर SC और ST को मिलने वाले आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं है।
इसके अलावा सोशल मीडिया पर आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और इसे हटाने की मांग से जुड़े कई डिजिटल कैंपेन भी चर्चा में आए हैं। इन अभियानों के कारण युवाओं के बीच भी आरक्षण के पक्ष और विरोध में बहस तेज हुई है।
मोहन भागवत ने आरक्षण पर क्या कहा?
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम के दौरान आरक्षण के लाभ को समाज के ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने की बात कही। उनका कहना था कि जिन लोगों ने आरक्षण का लाभ लेकर सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रगति कर ली है, उनमें यह भावना आनी चाहिए कि अब वे स्वेच्छा से पीछे हटें और अपने समुदाय के दूसरे लोगों को इसका फायदा लेने का अवसर दें।
भागवत से जब पूछा गया कि आरक्षण कब तक जारी रहना चाहिए या क्या इसे समाप्त कर देना चाहिए, तो उन्होंने इसका सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने इस सवाल को डॉ. भीमराव अंबेडकर के आरक्षण संबंधी विचारों से जोड़ते हुए उनकी सोच और सलाह को समझने की बात कही।
उन्होंने आरक्षित समुदायों के भीतर सब-कैटेगराइजेशन की मांग का भी जिक्र किया। भागवत के मुताबिक, ऐसी मांगों के पीछे यह सोच है कि आरक्षण का फायदा किसी समुदाय के सीमित लोगों तक ही न रहे, बल्कि उस समुदाय के अन्य जरूरतमंद हिस्सों तक भी पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने क्या कहा?
आरक्षण से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में SC, ST, OBC और EWS श्रेणियों के भीतर आय के आधार पर सब-कोटा या प्राथमिकता तय करने की मांग का विरोध किया।
केंद्र ने अदालत के सामने तर्क दिया कि SC और ST आरक्षण की बुनियाद आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि लंबे समय से चला आ रहा सामाजिक भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना है। इसी वजह से सरकार ने कहा कि OBC में लागू होने वाला ‘क्रीमी लेयर’ का सिद्धांत उसी रूप में SC और ST पर लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार ने यह भी कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक सूचियों में बदलाव का अधिकार संसद के पास है। संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत इन सूचियों में संशोधन संसदीय प्रक्रिया के जरिए किया जाता है।
इसी तरह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची में बदलाव के लिए भी संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। हालांकि राज्यों के पास अपने स्तर पर पिछड़े वर्गों की अलग सूची बनाने का अधिकार है।
केंद्र ने अदालत में यह तर्क भी रखा कि किसी विशेष आरक्षण नीति को तैयार करने के लिए न्यायपालिका से निर्देश मांगना उचित नहीं है। सरकार के मुताबिक नीति निर्माण मुख्य रूप से विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
SC-ST को आरक्षण किस आधार पर मिलता है?
भारत में आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य उन समुदायों को समान अवसर उपलब्ध कराना है, जो लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव, छुआछूत और अवसरों से वंचित रहने जैसी परिस्थितियों का सामना करते रहे हैं।
संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व सहित विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रावधान किए गए। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक मदद देना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक असमानता और प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करना भी है।
बाद में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के लिए आरक्षण का विस्तार हुआ। OBC आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की व्यवस्था है, जिसके तहत तय मानकों के आधार पर सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के अपेक्षाकृत संपन्न हिस्से को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है।
वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के लिए आरक्षण का आधार अलग है। यह व्यवस्था आर्थिक रूप से कमजोर उन वर्गों के लिए बनाई गई है, जो SC, ST और OBC आरक्षण के दायरे में नहीं आते।
अब बहस किस बात पर है?
मौजूदा बहस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि आरक्षण का लाभ संबंधित समुदायों के भीतर किस तरह अधिक समान रूप से पहुंचाया जाए। एक तरफ यह तर्क दिया जा रहा है कि जिन परिवारों या लोगों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है और वे बेहतर स्थिति में पहुंच गए हैं, उन्हें पीछे हटकर दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए अवसर छोड़ना चाहिए।
दूसरी तरफ यह तर्क है कि SC और ST आरक्षण को केवल आय या आर्थिक स्थिति के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इसका मूल आधार ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है।
यही कारण है कि मोहन भागवत का बयान और सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का रुख आरक्षण को लेकर चल रही बहस के दो महत्वपूर्ण पहलू बन गए हैं। आने वाले समय में चर्चा इसी सवाल के आसपास रहने की संभावना है कि आरक्षण का लाभ किसे मिलना चाहिए, लाभार्थियों के बीच प्राथमिकता कैसे तय हो और आरक्षण व्यवस्था में बदलाव का संवैधानिक रास्ता क्या हो।