जम्मू-कश्मीर की मस्जिदों में जुमा के खुतबे को लेकर वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव पर विवाद गहरा गया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इसका विरोध करते हुए इसे धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बताया है।
Knews Desk– जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड के एक प्रस्ताव ने राजनीतिक और धार्मिक बहस छेड़ दी है। प्रस्ताव में वक्फ के अंतर्गत आने वाली सभी मस्जिदों में शुक्रवार को दिए जाने वाले खुतबे में एकरूपता लाने की बात कही गई है। इसके तहत जुमा का खुतबा वक्फ बोर्ड की ओर से तय किए जाने का मुद्दा सामने आया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और कई अन्य धार्मिक एवं राजनीतिक हस्तियों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि मुसलमानों के धार्मिक मामलों में इस तरह का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे बीजेपी की ओर से धार्मिक मामलों में दखल देने की कोशिश बताया। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इस प्रस्ताव को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने वक्फ बोर्ड की बीजेपी द्वारा नियुक्त चेयरपर्सन से इस कदम को तुरंत रोकने की मांग भी की।
वहीं, महबूबा मुफ्ती ने भी इस मुद्दे पर बीजेपी को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है। महबूबा के मुताबिक, कभी मस्जिदों को तोड़ने की चर्चा होती है तो कभी जियारतगाहों को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। उन्होंने कहा कि पहले यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की बात की गई और अब धार्मिक गतिविधियों में भी एकरूपता लाने की कोशिश की जा रही है।
महबूबा मुफ्ती ने कहा कि मस्जिदें लोगों की आस्था और उनके योगदान से बनी हैं। वहां के मौलवी और इमाम ही बेहतर तरीके से जानते हैं कि शुक्रवार के खुतबे में किन मुद्दों पर बात की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब बीजेपी या आरएसएस के कार्यालय से यह तय किया जाएगा कि मस्जिदों में इमाम किस विषय पर बोलेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक मामलों में इस तरह की दखलअंदाजी उन्हें मंजूर नहीं है।
पीडीपी अध्यक्ष ने वक्फ बिल का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर इसके खिलाफ अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल या सरकार को किसी धर्म के धार्मिक मामलों में इस तरह हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। महबूबा ने यह भी कहा कि अगर किसी क्षेत्र में कोई घटना होती है, तो इमाम अपने खुतबे में उसका उल्लेख कर सकते हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार चाहती है कि मस्जिदों में किसी विशेष मुद्दे पर चर्चा हो, तो इस संबंध में मीरवाइज उमर फारूक की अध्यक्षता वाली मजलिस-ए-मुत्तहिदा मजलिस-उल-उलमा से बातचीत की जा सकती है। महबूबा के अनुसार, धार्मिक मामलों से जुड़े निर्णय लेने से पहले संबंधित धार्मिक विद्वानों से सलाह लेना जरूरी है।
महबूबा मुफ्ती ने केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू पर भी निशाना साधा। उन्होंने सवाल किया कि मुसलमानों के धार्मिक मामलों में निर्णय लेने का अधिकार किसे है। उन्होंने कहा कि रिजिजू को इस्लाम और मुसलमानों से जुड़े मुद्दों की जानकारी हो सकती है, लेकिन धार्मिक विषयों पर क्या कहा जाना चाहिए, इसका निर्णय धार्मिक विद्वानों और इमामों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि इस तरह का हस्तक्षेप किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड के अंतर्गत 5,009 मस्जिदें, 990 दरगाह, मजार और तीर्थस्थल, 790 खानकाहें तथा 15,592 कब्रिस्तान आते हैं। ऐसे में सभी मस्जिदों में जुमा के खुतबे को लेकर एकरूपता लाने के प्रस्ताव ने राजनीतिक विवाद को और बढ़ा दिया है।