Knews Desk-उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बीच मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए जमा किए गए फॉर्म-7 को लेकर विवाद सामने आया है। समाजवादी पार्टी की ओर से शिकायत किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने मामले का संज्ञान लिया। आरोप था कि नंद लाल के फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल करके फॉर्म-7 भरवाए गए और मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई। इस मामले में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि संबंधित फॉर्म स्वीकार किए जाने के बावजूद उन पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई और जांच के बाद संबंधित BLO के खिलाफ कार्रवाई की गई है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, समाजवादी पार्टी ने 15 अक्टूबर को आरोप लगाया था कि नंद लाल के नाम से फर्जी हस्ताक्षर करके फॉर्म-7 भरवाए गए। इन फॉर्म के माध्यम से मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाने की साजिश किए जाने का आरोप लगाया गया था। शिकायत के बाद सुल्तानपुर के जिला निर्वाचन अधिकारी से जानकारी प्राप्त की गई। इसके बाद विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र 189-सदर के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी से मामले की जांच कराई गई।जांच में सामने आया कि संबंधित बूथ लेवल ऑफिसर ने आवेदक की पहचान सुनिश्चित किए बिना फॉर्म-7 जमा कर लिए थे। चुनाव आयोग के मुताबिक, इन फॉर्म में आवेदक का नाम, मतदाता पहचान पत्र संख्या और मोबाइल नंबर जैसी आवश्यक जानकारियां भी उपलब्ध नहीं थीं। फॉर्म अधूरे होने के कारण इन पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई और मतदाता सूची से संबंधित लोगों के नाम नहीं हटाए गए। हालांकि, आवेदक की पहचान का सत्यापन किए बिना फॉर्म स्वीकार करना चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी जिम्मेदारियों में लापरवाही माना गया।
इस मामले में संबंधित BLO को पद से हटा दिया गया है। इसके अलावा, उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए संबंधित विभाग को भी निर्देशित किया गया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अनुसार, मामले में संबंधित BLO सुपरवाइजर की ओर से 24 अक्टूबर को गोसाईंगंज थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 336(3), 340(2) और 318(4) के तहत दर्ज की गई है।वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने मतदाता सूची में डुप्लीकेट प्रविष्टियों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है। उनका कहना है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र या अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में कई मतदाताओं और उनके संबंधियों के नाम समान हो सकते हैं। पिता, पति, पत्नी या कानूनी अभिभावक के नाम एक जैसे होने की स्थिति में केवल नाम की समानता के आधार पर किसी प्रविष्टि को डुप्लीकेट नहीं माना जा सकता।
निर्वाचन आयोग के अनुसार, वास्तविक डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करने, उनका सत्यापन करने और उन्हें हटाने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को सही और त्रुटिरहित बनाने के लिए लगातार काम किया जा रहा है। सुल्तानपुर का यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश में SIR के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दलों की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।