पंजाब चुनाव को लेकर कांग्रेस की बड़ी रणनीति, किसी सांसद को नहीं मिलेगा विधानसभा टिकट

Knews Desk- आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। पार्टी अब संगठनात्मक स्तर पर बड़े बदलाव की तैयारी में है और इसी क्रम में एक अहम फैसला सामने आया है कि किसी भी सांसद को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया जाएगा।

पार्टी से जुड़े सूत्रों के अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस बार पंजाब में नए चेहरों पर ज्यादा भरोसा जताने की तैयारी में है। यह रणनीति हाल ही में केरल में अपनाई गई रणनीति से प्रेरित बताई जा रही है, जहां कांग्रेस ने स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा करते हुए बेहतर चुनावी प्रदर्शन किया था।

सूत्रों का कहना है कि पार्टी का मानना है कि सांसदों को विधानसभा चुनाव में उतारने से संगठन में अंदरूनी गुटबाजी बढ़ती है, जिससे चुनावी तैयारियों पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से तय किया गया है कि लोकसभा सांसदों को इस बार विधानसभा चुनाव की टिकट नहीं दी जाएगी। इसके बजाय, पार्टी सभी बड़े नेताओं और सांसदों को अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने और अधिक से अधिक सीटें जिताने की जिम्मेदारी देने की योजना बना रही है। इन नेताओं से अपेक्षा होगी कि वे चुनावी प्रबंधन और प्रचार में सक्रिय भूमिका निभाएं।

पंजाब में सीट बंटवारे को लेकर भी पार्टी नए फॉर्मूले पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, इस बार किसी भी बड़े नेता के लिए सीटों का कोटा तय नहीं किया जाएगा। उम्मीदवारों का चयन सर्वे रिपोर्ट, जमीनी स्थिति और राज्य प्रभारियों की सिफारिशों के आधार पर किया जाएगा। इसके अलावा पार्टी की योजना बड़ी संख्या में नए चेहरों को मौका देने की है। संगठन को मजबूत करने और जनता से सीधा जुड़ाव बढ़ाने के लिए आधे से अधिक टिकट नए उम्मीदवारों को दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। यह कदम पार्टी के अंदर नई ऊर्जा लाने और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

एक और अहम रणनीति के तहत ‘एक परिवार, एक टिकट’ फॉर्मूले पर भी विचार किया जा रहा है। इसके तहत किसी भी राजनीतिक परिवार से केवल एक ही व्यक्ति को टिकट दिए जाने की व्यवस्था लागू हो सकती है, ताकि वंशवाद और आंतरिक प्रतिस्पर्धा को कम किया जा सके। गौरतलब है कि इससे पहले केरल में हुए चुनाव में भी कांग्रेस ने इसी तरह की रणनीति अपनाई थी। वहां पार्टी ने लोकसभा सांसदों को विधानसभा चुनाव में नहीं उतारा था और स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जताया था। परिणामस्वरूप, कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सत्ता में वापसी की थी।

उस चुनाव में UDF ने 102 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को 35 सीटें मिली थीं। एनडीए के खाते में 3 सीटें गई थीं। अकेले कांग्रेस ने 140 में से 63 सीटें जीतकर मजबूत वापसी की थी। इसी सफलता को देखते हुए अब पंजाब में भी पार्टी उसी मॉडल को दोहराने की कोशिश में है, ताकि आगामी चुनाव में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकें और राज्य में संगठन को फिर से मजबूत किया जा सके।

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