Knews Desk – नोएडा में मजदूर आंदोलन के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और छात्र नेता आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने का मामला अब चर्चा में है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में 15 पन्नों के फैसले में नोएडा की डीएम मेधा रूपम की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि डीएम ने अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया और पुलिस की रिपोर्ट को उचित तरीके से वैरिफाई नहीं किया।
हाई कोर्ट की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेवा की बेंच ने कहा कि संविधान अधिकारियों को व्यापक शक्तियां देता है, लेकिन इनका इस्तेमाल जनहित में होना चाहिए। गलत तरीके से शक्ति का इस्तेमाल राज्य को दमनकारी बना सकता है। मामले में कोर्ट के सामने पांच प्रमुख सवाल सामने आए।
पहला, आकृति की गिरफ्तारी की तारीख को लेकर विवाद हुआ। याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि पुलिस ने उन्हें 11 अप्रैल को ही हिरासत में ले लिया था, जबकि गिरफ्तारी 12 अप्रैल को दिखाई गई। इसके समर्थन में चैट और अन्य साक्ष्य पेश किए गए। दूसरा, जनरल डायरी और नोटिस की टाइमिंग पर सवाल उठा। कोर्ट ने कहा कि 12 अप्रैल को सुबह 10:30 बजे जनरल डायरी तैयार हुई, जबकि नोटिस पर तारीख तो थी, लेकिन समय दर्ज नहीं था। इससे गिरफ्तारी और नोटिस की प्रक्रिया पर संदेह पैदा हुआ।
तीसरा, कोर्ट ने पूछा कि आकृति ने ऐसा कौन सा बयान या नारा दिया था, जिससे हिंसा भड़काने या देश विरोधी गतिविधि का आरोप साबित हो। प्रशासन और पुलिस की ओर से पेश वीडियो में कोर्ट को ऐसा कोई स्पष्ट सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन को नागरिक का अधिकार बताया। चौथा, हाई कोर्ट ने कहा कि या तो डीएम ने NSA लगाने से पहले पुलिस रिपोर्ट को वैरिफाई नहीं किया या फिर जानबूझकर ऐसा किया। कोर्ट ने आकृति को NSA के तहत हिरासत में रखने को अनुच्छेद 21 से जुड़ा गंभीर मामला माना और डीएम को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।
पांचवां, कोर्ट ने मुआवजे के तौर पर 50 लाख रुपये लगाने पर विचार किया, लेकिन राज्य सरकार के वकील की दलील के बाद इसे घटाकर 5 लाख रुपये कर दिया। फैसले में हाई कोर्ट ने नौकरशाही के मनमाने रवैये को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश एक ऐसे माहौल में बदल सकता है, जहां सरकार का नियंत्रण बढ़े और नागरिक स्वतंत्रताएं कमजोर हों। कोर्ट ने अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि उनकी प्राथमिक निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी सरकार के प्रति।