Knews Desk- पुणे में केतन अग्रवाल मर्डर केस में मंगेतर सिया गोयल का लाई डिटेक्टर टेस्ट होगा. ये क्या और कैसे होता है? पॉलीग्राफ मशीन क्या है और ये झूठ पकड़ने का काम कैसे करती है? क्या इसके नतीजे हमेशा सही ही साबित होते हैं? भारत में इसको लेकर कानून क्या कहता है?
लाई डिटेक्टर टेस्ट से सच आएगा सामने
पुणे के केतन अग्रवाल मर्डर केस की जांच में लाई डिटेक्टर टेस्ट की एंट्री हो गई है. लोहागढ़ फोर्ट में ट्रैकिंग के दौरान केतन की मौत की बात सामने आई थी लेकिन ये प्लान के साथ किया मर्डर केस साबित हुआ. पुलिस की जांच थियरी कहती है कि मंगेतर सिया ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर इस खौफनाक साजिश को अंजाम दिया. हालांकि इस मामले में कोई गवाह या सीसीटीवी सबूत नहीं होने की वजह से पुलिस के हाथ खाली हैं. अभी तक फोन कॉल, चैट के साथ ही डिजिटल सबूतों के आधार पर फाइल तैयार कर रही पुलिस अब पॉलीग्राफ टेस्ट यानी लाई डिटेक्टर टेस्ट कराने जा रही है.
क्या होता हैं लाइव डिटेक्टर टेस्ट ?
झूठ को पकड़ने वाली मशीन क्या होती है? लाई डिटेक्टर टेस्ट क्या और कैसे होता है? पॉलीग्राफ मशीन क्या है और ये झूठ पकड़ने का काम कैसे करती है? क्या इसके नतीजे हमेशा सही ही साबित होते हैं? इस टेस्ट के दौरान कौन से शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं? भारत में इसको लेकर कानून क्या कहता है? क्या अदालत इसको सबूत के तौर पर मान्यता देती है? आइए हर एक सवाल का जवाब तलाशते हैं.
हाइ प्राफाइल केसेस़ मे किया जाता इसका इस्तेमाल
आज के इस आधुनिक दौर में जब किसी बड़े अपराध की गुत्थी उलझ जाती है तो जांच एजेंसियां अक्सर एक खास तकनीक का सहारा लेती हैं. इसको पॉलीग्राफ टेस्ट या आम बोलचाल में ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ कहा जाता है. फिल्मों से लेकर असल जिंदगी के हाई-प्रोफाइल क्रिमिनल केस तक आपने इस टेस्ट का जिक्र कई बार सुना होगा. लेकिन क्या यह मशीन वाकई इंसान के दिमाग में चल रहे झूठ को पकड़ सकती है?