KNEWS DESK- मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को शिकस्त देकर पार्टी को बड़ी सफलता दिलाई है। मतगणना के दौरान घनश्याम सिंह शुरुआत से बढ़त बनाए रहे और आखिर में 6,029 वोटों से आगे रहे। इस जीत को मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक नतीजे के आधिकारिक ऐलान का इंतजार था।
बीजेपी ने इस उपचुनाव में आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया था, जबकि कांग्रेस ने क्षेत्र के पुराने और अनुभवी नेता घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा। दतिया में बीजेपी को पीछे छोड़ने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं और घनश्याम सिंह के समर्थकों में उत्साह देखने को मिला। लेकिन सवाल है कि आखिर घनश्याम सिंह कौन हैं और दतिया की राजनीति में उनकी इतनी मजबूत पकड़ कैसे बनी?
दतिया राजघराने के मुखिया हैं घनश्याम सिंह
घनश्याम सिंह मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और लंबे समय से दतिया तथा आसपास के क्षेत्रों की राजनीति में सक्रिय हैं। वह दतिया राजघराने के मुखिया भी हैं। हालांकि उनकी राजनीतिक पहचान केवल राजघराने तक सीमित नहीं रही। वर्षों से क्षेत्र में सक्रिय रहने और लोगों से सीधे संपर्क के कारण उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार की है।
दतिया के साथ-साथ सेवढ़ा विधानसभा क्षेत्र में भी उनका प्रभाव माना जाता है। चुनावी राजनीति में लंबे अनुभव और स्थानीय स्तर पर मजबूत नेटवर्क को उनकी बड़ी ताकत माना जाता है।
1993 में पहली बार बने विधायक
घनश्याम सिंह का राजनीतिक सफर करीब तीन दशक पुराना है। उन्होंने 1993 में कांग्रेस के टिकट पर दतिया विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और पहली बार जीत दर्ज कर विधायक बने। इसके बाद 1998 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि 2003 में उन्होंने वापसी की और एक बार फिर दतिया से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
2008 के विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला बीजेपी नेता नरोत्तम मिश्रा से हुआ, जिसमें उन्हें हार मिली। इसके बाद 2013 में भी उन्हें सफलता नहीं मिली और बीजेपी उम्मीदवार प्रदीप अग्रवाल ने उन्हें शिकस्त दी।
सेवढ़ा से भी रह चुके हैं विधायक
दतिया में लगातार दो चुनावी हार के बावजूद घनश्याम सिंह ने अपनी राजनीतिक सक्रियता कम नहीं की। 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने सेवढ़ा सीट से किस्मत आजमाई।
इस चुनाव में उन्होंने बीजेपी के राधेलाल बघेल को हराकर जीत दर्ज की और तीसरी बार विधायक बने। इसके बाद 2023 के विधानसभा चुनाव में वह फिर सेवढ़ा से मैदान में उतरे, लेकिन इस बार बीजेपी के प्रदीप अग्रवाल से हार गए। इस तरह घनश्याम सिंह दतिया से दो बार और सेवढ़ा से एक बार विधायक रह चुके हैं।
हार के बाद भी क्षेत्र में रहे सक्रिय
चुनावी हार के बावजूद घनश्याम सिंह ने कांग्रेस संगठन और स्थानीय राजनीति में अपनी सक्रियता बनाए रखी। दतिया और सेवढ़ा दोनों क्षेत्रों में लगातार संपर्क बनाए रखना उनकी राजनीति की खासियत मानी जाती है।
दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव की स्थिति बनने के बाद कांग्रेस के सामने मजबूत उम्मीदवार चुनने की चुनौती थी। पार्टी को ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के साथ क्षेत्र के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों पर पकड़ रखता हो। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व ने अनुभवी घनश्याम सिंह पर भरोसा जताया।
कांग्रेस की उम्मीदों पर खरे उतरे घनश्याम
उपचुनाव में घनश्याम सिंह ने पार्टी की उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन किया। मतगणना के दौरान वह बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी पर लगातार बढ़त बनाए रहे और 6,029 वोटों की बढ़त के साथ मुकाबला अपने पक्ष में किया। मध्य प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही कांग्रेस के लिए दतिया का परिणाम मनोबल बढ़ाने वाला माना जा रहा है। वहीं बीजेपी के लिए यह नतीजा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि दतिया की राजनीति में पार्टी का भी मजबूत प्रभाव रहा है।
घनश्याम सिंह की सफलता ने एक बार फिर साबित किया है कि स्थानीय पकड़, लंबे राजनीतिक अनुभव और क्षेत्र में लगातार सक्रियता चुनावी मुकाबले में बड़ा अंतर पैदा कर सकती है। दतिया उपचुनाव का नतीजा कांग्रेस के लिए सिर्फ एक सीट की जीत नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक मुकाबलों से पहले महत्वपूर्ण संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।