देशभर में धूमधाम से मनाई जा रही बकरीद, जानिए तीन दिनों तक कुर्बानी देने की क्या है परंपरा

KNEWS DESK- आज देशभर में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार पूरे धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस्लाम धर्म का यह प्रमुख पर्व जुल-हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। बकरीद को त्याग, बलिदान और इंसानियत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग विशेष नमाज अदा करते हैं, गरीबों और जरूरतमंदों में दान बांटते हैं तथा अल्लाह की राह में कुर्बानी पेश करते हैं।

इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, बकरीद की परंपरा हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की उस महान कुर्बानी की याद में मनाई जाती है, जब उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का फैसला किया था। कहा जाता है कि अल्लाह ने लगातार तीन दिनों तक उन्हें सपने में अपनी सबसे प्रिय वस्तु की कुर्बानी देने का आदेश दिया। हजरत इब्राहिम समझ गए कि उनके बेटे हजरत इस्माइल ही उन्हें सबसे अधिक प्रिय हैं।

जब हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे को इस बारे में बताया तो हजरत इस्माइल ने भी अल्लाह के हुक्म के आगे सिर झुका दिया और कुर्बानी के लिए तैयार हो गए। यह एक बहुत बड़ा इम्तिहान था, लेकिन हजरत इब्राहिम का भरोसा अपने रब पर अटल था। जैसे ही उन्होंने कुर्बानी देने का प्रयास किया, अल्लाह ने हजरत इस्माइल की जगह एक दुम्बा भेज दिया। तभी से कुर्बानी की यह परंपरा शुरू हुई और आज तक निभाई जा रही है।ईद-उल-अजहा का त्योहार तीन दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान मुसलमान अपनी क्षमता के अनुसार बकरे, बकरी, भेड़, दुम्बा, भैंस, बैल या ऊंट की कुर्बानी देते हैं। इस्लाम में हर जानवर की कुर्बानी के लिए एक निर्धारित उम्र तय की गई है। बकरे या बकरी की उम्र कम से कम एक साल, भेड़ या दुम्बे की छह माह, भैंस या बैल की दो साल और ऊंट की उम्र पांच साल होना जरूरी माना गया है।

कुर्बानी के गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटने की परंपरा भी इस पर्व का अहम हिस्सा है। एक हिस्सा अपने परिवार के लिए रखा जाता है, दूसरा रिश्तेदारों और पड़ोसियों में बांटा जाता है, जबकि तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है। यही परंपरा समाज में बराबरी, भाईचारे और इंसानियत का संदेश देती है।

बकरीद केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और मानवता की भावना को मजबूत करने का संदेश भी है। यह त्योहार लोगों को सिखाता है कि सच्ची इबादत केवल रस्मों में नहीं, बल्कि दूसरों की मदद और अल्लाह के प्रति सच्चे समर्पण में है।