जर्मनी के 30 से अधिक शहरों में ‘Gen Z regelt’ आंदोलन के तहत हजारों युवा सड़कों पर उतरे। शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती, बढ़ती महंगाई और सैन्य सेवा को लेकर चिंताओं के बीच शुरू हुए प्रदर्शनों में कुछ जगह हिंसा भी हुई। भारत के हालिया छात्र आंदोलनों से इसकी तुलना करते हुए मांगों और राजनीतिक परिस्थितियों में बड़े अंतर सामने आते हैं।
Knews Desk – जर्मनी में अक्टूबर 2026 के आखिरी सप्ताह में उभरे ‘Gen Z regelt’ युवा आंदोलन ने देश की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। बर्लिन, फ्रैंकफर्ट, हैम्बर्ग और म्यूनिख समेत 30 से अधिक शहरों में हजारों युवा प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरे। शुरुआत में शांतिपूर्ण रहे इन प्रदर्शनों के कुछ हिस्सों में शाम होते-होते हिंसा की घटनाएं सामने आईं।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख चिंताओं में शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च में कटौती, बढ़ती जीवन-यापन लागत और सैन्य सेवा की संभावित अनिवार्यता शामिल हैं। युवाओं का कहना है कि सरकार को रक्षा खर्च बढ़ाने के बजाय शिक्षा और विकास जैसे क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
शिक्षा में कटौती और बढ़ती महंगाई से नाराज युवा
जर्मनी में युवाओं के असंतोष के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। पहला, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं के लिए पर्याप्त बजट नहीं मिलने की शिकायत। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों को जरूरी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जबकि रक्षा खर्च बढ़ाया जा रहा है।
दूसरा कारण सैन्य सेवा को लेकर चिंता है। जर्मनी में नई स्वैच्छिक सैन्य सेवा योजना को लेकर युवाओं के एक वर्ग को आशंका है कि भविष्य में सैन्य सेवा फिर से अनिवार्य की जा सकती है। आंदोलन से जुड़े युवा चाहते हैं कि सरकार सैन्य खर्च के बजाय शिक्षा और विकास को प्राथमिकता दे।
तीसरी बड़ी वजह बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत है। धीमी आर्थिक वृद्धि और महंगाई के बीच युवाओं की क्रय शक्ति प्रभावित हुई है। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि सरकार उनकी समस्याओं का पर्याप्त समाधान नहीं कर रही है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच कैसे भड़की हिंसा?
जर्मनी में कुछ स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान हिंसा की घटनाएं सामने आईं। फ्रैंकफर्ट में दुकानों के शीशे तोड़े जाने, मोलोटोव कॉकटेल फेंके जाने और पुलिस पर पटाखे, पत्थर तथा बोतलें फेंके जाने की खबरें आईं। हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने वॉटर कैनन और पेपर स्प्रे का इस्तेमाल किया।
हेस्से राज्य के गृह मंत्री रोमन पोसेक के मुताबिक, फ्रैंकफर्ट में करीब 100 स्पष्ट रूप से पहचाने गए वामपंथी चरमपंथियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन में घुसपैठ कर हिंसा भड़काई। जर्मन अधिकारियों ने पहले भी आशंका जताई थी कि चरमपंथी समूह छात्र प्रदर्शनों का इस्तेमाल सड़क पर अराजकता फैलाने के लिए कर सकते हैं।
वहीं, ‘Gen Z regelt’ आंदोलन के आयोजकों ने हिंसा से दूरी बनाते हुए कहा कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण है। सरकार और पुलिस का मानना है कि कुछ तत्वों ने आंदोलन का फायदा उठाया।
भारत और जर्मनी के युवा आंदोलनों में क्या अंतर?
भारत और जर्मनी में युवाओं के प्रदर्शनों की तुलना करने पर उनकी मांगों और राजनीतिक संदर्भ में अंतर दिखाई देता है।
भारत में 2026 के दौरान हुए कुछ छात्र प्रदर्शनों में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR), चुनावी पारदर्शिता और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। दूसरी ओर, जर्मनी में युवाओं का असंतोष शिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं, महंगाई और सैन्य सेवा जैसे विषयों से जुड़ा है।
दोनों देशों के आंदोलनों के राजनीतिक संदर्भ भी अलग हैं। भारत में संबंधित प्रदर्शन मुख्य रूप से घरेलू चुनावी प्रक्रियाओं और संस्थागत जवाबदेही पर केंद्रित रहे, जबकि जर्मनी का आंदोलन यूरोप के दूसरे देशों में उभर रहे युवा आंदोलनों की व्यापक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।
हिंसा के मामले में भी स्थिति एक जैसी नहीं रही। जर्मनी के कुछ शहरों में तोड़फोड़ और पुलिस पर हमलों की घटनाएं सामने आईं। भारत के जिन हालिया छात्र प्रदर्शनों का यहां उल्लेख है, उनमें मुख्य मुद्दे चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही रहे।
‘Gen Z regelt’ आंदोलन क्या संदेश दे रहा है?
जर्मनी में युवा आंदोलन को केवल छात्र असंतोष तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके पीछे भविष्य को लेकर अनिश्चितता, आर्थिक दबाव और सरकार द्वारा युवाओं की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने की भावना भी बताई जा रही है।
आंदोलन का नारा ‘Gen Z regelt’ मोटे तौर पर यह संदेश देता है कि युवा अपनी समस्याओं का समाधान खुद करना चाहते हैं। प्रदर्शनकारियों की मांगों में शिक्षा और विकास पर अधिक खर्च तथा सैन्य सेवा को लेकर स्पष्टता शामिल है।
यह आंदोलन सरकारों के सामने एक अहम सवाल रखता है कि क्या आर्थिक नीतियों और सार्वजनिक खर्च से जुड़े फैसलों में युवाओं की जरूरतों को पर्याप्त जगह मिल रही है। किसी भी लोकतंत्र में हिंसा और तोड़फोड़ स्वीकार्य नहीं है, लेकिन विरोध के पीछे मौजूद असंतोष और संवाद की जरूरत को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।