Knews Desk– यूरोप के कई देशों में विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की घटनाओं ने सरकारों के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। इटली से फ्रांस और अल्बानिया तक लोगों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दे रहा है। इन प्रदर्शनों के पीछे महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति और सरकारी नीतियों को लेकर नाराजगी जैसे मुद्दे बताए जा रहे हैं। कई जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए हैं, जहां आगजनी, तोड़फोड़ और दुकानों में लूटपाट की घटनाएं सामने आई हैं।
इटली के मिलान और नेपल्स जैसे शहरों में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, महंगे स्टोरों के साथ छोटी दुकानों और बाजारों में भी लूटपाट हुई है। इन घटनाओं से कारोबारियों में चिंता बढ़ी है और कुछ दुकानदार अपनी सुरक्षा के लिए खुद हथियार लेकर दुकानों के बाहर खड़े दिखाई दिए।इटली में ईंधन की बढ़ती कीमतों और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति को लेकर भी लोगों में नाराजगी है। रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन को इटली की ओर से दिए जा रहे समर्थन पर भी राजनीतिक बहस जारी है। दक्षिणपंथी नेशनल फ्यूचर पार्टी ने यूक्रेन को हथियार और आर्थिक सहायता देने की आलोचना की है। उसका तर्क है कि सरकार को पहले अपने देश की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा से निपटने के लिए आपात बैठक बुलाई। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनों के दौरान करीब 330 लोगों को हिरासत में लिया गया। सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। नए प्रावधानों के तहत दोषियों को पांच साल तक की जेल और 20 हजार यूरो तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।फ्रांस में भी प्रदर्शनकारियों की ओर से तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं सामने आई हैं। रेनेस सहित कई शहरों में आगजनी, बैरिकेड जलाने और पुलिस पर हमले की खबरें हैं। बताया जा रहा है कि आंदोलन की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था और महंगाई से जुड़ी नाराजगी के बीच हुई थी, लेकिन बाद में इसका दायरा बढ़ गया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाने और जरूरत पड़ने पर प्रतिबंध लागू करने की बात कही है।
वहीं, अल्बानिया में प्रधानमंत्री एदी रामा के खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारियों की नाराजगी का एक कारण साजान द्वीप पर प्रस्तावित लक्जरी रिसॉर्ट परियोजना भी है। इस परियोजना में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर की कंपनी के निवेश की बात कही गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से महत्वपूर्ण है और यहां फ्लेमिंगो पक्षियों का निवास है। इसी वजह से आंदोलन को ‘फ्लेमिंगो क्रांति’ का नाम दिया गया है। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जबकि एदी रामा ने पद छोड़ने से इनकार किया है।अल्बानिया के प्रधानमंत्री ने बातचीत के लिए तैयार होने की बात कही है। हालांकि, इटली, फ्रांस और अल्बानिया में हालात को लेकर कई सवाल बने हुए हैं। महंगाई, सरकारी नीतियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की नाराजगी के बीच हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। इन आंदोलनों का आगे क्या रूप होगा, यह संबंधित देशों की राजनीतिक परिस्थितियों और सरकारों की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।