परिणीति चोपड़ा की फिल्म में पत्रकारिता का काला सच, लेकिन कमजोर कहानी ने किया निराश

परिणीति चोपड़ा की फिल्म ‘रिपोर्टिंग लाइव’ में अवैध रेत खनन, कॉर्पोरेट दबाव और पत्रकारिता की चुनौतियों को दिखाने की कोशिश की गई है। आदिल हुसैन और शेखर सुमन की अदाकारी प्रभावित करती है, लेकिन कमजोर लेखन, सतही रिसर्च और धीमी रफ्तार के कारण फिल्म एक प्रभावशाली इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर बनने से चूक जाती है।

Knews Desk – हिंदी सिनेमा में पत्रकारिता पर आधारित फिल्मों की कमी नहीं है, लेकिन ऐसी कहानियां कम ही देखने को मिलती हैं, जो न्यूज़रूम की राजनीति से लेकर फील्ड रिपोर्टिंग के जोखिमों तक को वास्तविकता के करीब दिखा सकें। ‘रिपोर्टिंग लाइव’ भी इसी दुनिया की कहानी लेकर आई है। फिल्म में परिणीति चोपड़ा ने ‘आजाद भारती’ चैनल की रिपोर्टर संध्या यादव का किरदार निभाया है, जो एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश करने की कोशिश करती है। फिल्म का विषय दमदार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसकी कहानी दर्शकों को बांधकर रख पाती है?

क्या है फिल्म की कहानी?

‘रिपोर्टिंग लाइव’ की कहानी संध्या यादव और उनके भरोसेमंद कैमरामैन विनोद के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों मुंबई के एक हिंदी न्यूज चैनल में काम करते हैं। संध्या का सपना प्राइम टाइम में अपनी जगह बनाना और करियर में आगे बढ़ना है। उसकी जिंदगी तब बदल जाती है, जब महाराष्ट्र के एक ग्रामीण इलाके में पुल ढहने का हादसा होता है।

इस घटना की पड़ताल के लिए संध्या और विनोद मौके पर पहुंचते हैं। जांच के दौरान उन्हें अवैध रेत खनन के एक बड़े नेटवर्क का पता चलता है, जिसके तार बिल्डरों, उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट जगत के प्रभावशाली लोगों से जुड़े होते हैं। संध्या इस पूरे मामले को उजागर करने का फैसला करती है, लेकिन जल्द ही उसे धमकियों, गवाहों की हत्याओं और अपने ही चैनल के भीतर खबर दबाने की कोशिशों का सामना करना पड़ता है।

कहानी में भ्रष्टाचार, सत्ता और पत्रकारिता के बीच संघर्ष दिखाने की कोशिश की गई है। हालांकि, मजबूत विषय होने के बावजूद इसकी प्रस्तुति कई जगह कमजोर पड़ जाती है।

कैसी है फिल्म?

इन्वेस्टिगेटिव पत्रकारिता पर आधारित फिल्म में रोमांच, तनाव और लगातार बदलते घटनाक्रम की उम्मीद की जाती है। ‘रिपोर्टिंग लाइव’ की शुरुआत एक गंभीर घटना से होती है, लेकिन कुछ दृश्य इतने बनावटी लगते हैं कि कहानी का प्रभाव कमजोर हो जाता है।

संध्या के किरदार में एक अनुभवी टीवी रिपोर्टर जैसी बेचैनी और पेशेवर समझ की कमी महसूस होती है। कई मौकों पर उसका व्यवहार ऐसा लगता है, जैसे उसे पत्रकारिता की जमीनी चुनौतियों का पर्याप्त अनुभव ही नहीं है। माफिया के इलाके में शूटिंग के दौरान खुद को डॉक्यूमेंट्री बनाने वाला बताने जैसे दृश्य भी कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं।

फिल्म की एक और बड़ी कमजोरी यह है कि पत्रकारिता की जटिलताओं को बहुत आसानी से सुलझते हुए दिखाया गया है। गंभीर विषयों पर बनी फिल्म से जिस तरह की गहराई और वास्तविकता की उम्मीद होती है, वह यहां पूरी तरह नजर नहीं आती।

निर्देशन और लेखन में कहां हुई चूक?

फिल्म की पटकथा में बारीकियों की कमी साफ महसूस होती है। ग्रामीण इलाकों को दिखाने के लिए पारंपरिक पीले-भूरे रंगों का इस्तेमाल और खलनायकों को खतरनाक दिखाने के पुराने तरीके कहानी को घिसा-पिटा बनाते हैं।

न्यूज़रूम की कार्यप्रणाली भी कई जगह सतही नजर आती है। किसी बड़ी खबर को बिना पर्याप्त तैयारी के सीधे प्रसारित कर देना या संवेदनशील मामलों में सुरक्षा और सत्यापन की प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करना फिल्म की विश्वसनीयता कम करता है।

डायलॉग भी कई जगह जरूरत से ज्यादा किताबी लगते हैं। पत्रकारिता की नैतिकता और कॉर्पोरेट दबाव जैसे गंभीर मुद्दों को प्रभावशाली तरीके से उठाने के बजाय फिल्म कई बार मेलोड्रामा का सहारा लेती है। यही वजह है कि कहानी का तनाव लगातार बरकरार नहीं रह पाता।

एक्टिंग में किसने किया प्रभावित?

अभिनय के मामले में आदिल हुसैन और शेखर सुमन सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। आदिल हुसैन ने एग्जीक्यूटिव एडिटर का किरदार निभाया है, जो चैनल के कॉर्पोरेट मालिकों के दबाव और पत्रकारिता के मूल्यों के बीच फंसा हुआ है। उनके किरदार में नैतिक संघर्ष और पेशेवर मजबूरी की झलक देखने को मिलती है।

वहीं, शेखर सुमन कॉर्पोरेट बॉस के रूप में नपी-तुली अदाकारी करते हैं। उनका किरदार यह दिखाता है कि किस तरह कारोबारी हित खबरों की दिशा और प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते हैं।

परिणीति चोपड़ा भी संध्या यादव के किरदार को निभाने की कोशिश करती हैं, लेकिन कमजोर लेखन के कारण उनका किरदार उतना प्रभावशाली नहीं बन पाता, जितना इस कहानी के लिए जरूरी था। अमोल पालेकर अपने छोटे से किरदार में सहजता और गरिमा बनाए रखते हैं।

देखें या नहीं?

‘रिपोर्टिंग लाइव’ उन फिल्मों में शामिल नहीं होती, जो शुरुआत से अंत तक दर्शकों को बांधे रखें। कहानी की धीमी रफ्तार और कई जगह कमजोर पड़ते घटनाक्रम के कारण इसे देखते समय ध्यान भटक सकता है। फिल्म में एक दमदार इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर बनने की संभावनाएं थीं, लेकिन कमजोर पटकथा और सतही प्रस्तुति ने उन पर पानी फेर दिया।

अगर आप पत्रकारिता, कॉर्पोरेट दबाव और भ्रष्टाचार पर आधारित कहानियां पसंद करते हैं, तो इसे कलाकारों के अभिनय के लिए एक बार देख सकते हैं। हालांकि, अगर आप रोमांच, तेज रफ्तार और चौंकाने वाले खुलासों से भरपूर थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म आपको निराश कर सकती है।

कुल मिलाकर, ‘रिपोर्टिंग लाइव’ की कहानी का विचार अच्छा है, लेकिन उसका क्रियान्वयन कमजोर है। यह फिल्म पत्रकारिता की चुनौतियों को छूती जरूर है, मगर उन्हें गहराई और प्रभाव के साथ पर्दे पर उतारने में सफल नहीं हो पाती।

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