सऊदी की मदद को तैयार पाकिस्तान, लेकिन ईरान से सीधी जंग से बचने की कोशिश

मक्का समझौते के तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब पर बाहरी हमला होने की स्थिति में हरसंभव सैन्य सहायता देने का ऐलान किया है। हालांकि, ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने को लेकर इस्लामाबाद ने अभी स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है।

Knews Desk-पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर बड़ा बयान दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कहा है कि अगर सऊदी अरब पर किसी बाहरी ताकत की ओर से हमला होता है, तो पाकिस्तान अपनी उपलब्ध सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल कर उसकी रक्षा करेगा। उनका यह बयान पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच हुए ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के बाद सामने आया है।

ख्वाजा आसिफ ने रोम दौरे के दौरान सऊदी अरब पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब का कोई भी दुश्मन पाकिस्तान का दुश्मन माना जाएगा। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि क्या पाकिस्तानी सेना यमन में ईरान समर्थित ठिकानों के खिलाफ सीधे हवाई कार्रवाई या किसी सैन्य अभियान में हिस्सा ले रही है, तो उन्होंने इसकी स्पष्ट पुष्टि नहीं की।

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने कहा कि समझौते के तहत उनका देश अपनी रक्षात्मक क्षमताएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान फिलहाल सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता जता रहा है, लेकिन ईरान के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने से बचने की कोशिश कर रहा है।

मक्का समझौता पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच 7 अगस्त को मक्का में हुआ था। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होने की स्थिति में उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, तीनों देशों ने इस समझौते को रक्षात्मक बताते हुए स्पष्ट किया है कि इसका उद्देश्य किसी दूसरे देश के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई करना नहीं है।

समझौते को लागू करने और तीनों देशों के बीच रणनीतिक समन्वय बढ़ाने के लिए सऊदी अरब में एक विशेष सचिवालय स्थापित किया जा रहा है। अभी गठबंधन की कमान और परिचालन व्यवस्था को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

इस बीच हूती विद्रोहियों की गतिविधियां भी पाकिस्तान और सऊदी अरब के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। ख्वाजा आसिफ के मुताबिक, हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर स्थित बंदरगाह शहर मोखा और कई रणनीतिक द्वीपों पर अपना नियंत्रण बढ़ाया है। इससे बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंता बढ़ी है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

हूतियों की ओर से सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और जहाजों को निशाना बनाए जाने के बाद मक्का समझौते के तहत सुरक्षा सहयोग को लेकर चर्चा तेज हुई है। हाल ही में पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के सैन्य प्रमुखों की रियाद में बैठक भी हुई थी, जिसमें हूती हमलों से निपटने को लेकर चर्चा की गई।

हालांकि, पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सऊदी अरब के साथ सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने के साथ ईरान के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखना है। पाकिस्तान और ईरान पड़ोसी देश हैं और दोनों के बीच लंबे समय से कूटनीतिक संबंध रहे हैं। ऐसे में इस्लामाबाद ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल होने से बचते हुए बातचीत का रास्ता भी खुला रखना चाहता है।

ख्वाजा आसिफ ने भी व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत पर जोर दिया है। उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत के जरिए समझौते को दोबारा शुरू करने का समर्थन किया। पाकिस्तान ने इस साल की शुरुआत में भी क्षेत्रीय तनाव कम करने और अमेरिका तथा ईरान के बीच बातचीत की कोशिशों में भूमिका निभाने का प्रयास किया था।

अप्रैल में इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत की मेजबानी भी पाकिस्तान ने की थी। दोनों पक्षों ने जून में एक अंतरिम समझौते पर सहमति जताई थी और 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते तक पहुंचने की कोशिश करने की बात कही थी। हालांकि, दोबारा शत्रुता शुरू होने के बाद यह समयसीमा समाप्त हो गई।

हाल ही में पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के शीर्ष राजनयिकों की संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर भी बैठक हुई। इसमें नए रक्षा समझौते को लागू करने और सऊदी अरब में मक्का समेत अन्य स्थानों पर हुए हमलों के जवाब को लेकर आपसी तालमेल पर चर्चा की गई।

फिलहाल पाकिस्तान की स्थिति दो स्तरों पर दिखाई दे रही है। एक ओर वह मक्का समझौते के तहत सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए सैन्य सहयोग का भरोसा दे रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ सीधे युद्ध में शामिल होने के बजाय बातचीत और कूटनीति का विकल्प खुला रखना चाहता है। गठबंधन की वास्तविक सैन्य भूमिका और इसकी परिचालन संरचना अभी विकसित की जा रही है।

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