यौन अपराधों से जुड़े कुछ हाई कोर्ट के फैसलों और टिप्पणियों ने कानून की व्याख्या, न्यायिक भाषा और पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता को लेकर देशभर में बहस छेड़ दी. कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बाद में हाई कोर्ट की व्याख्या को बदलते हुए अपराध की गंभीरता और आरोपी की मंशा को अहम माना.
Knews Desk- यौन अपराधों के मामलों में अदालत का फैसला सिर्फ आरोपी और पीड़ित के भविष्य को प्रभावित नहीं करता, बल्कि यह भी तय करता है कि कानून ऐसे मामलों को किस नजरिए से देखता है. बीते कुछ समय में अलग-अलग हाई कोर्ट के कुछ फैसले इसी वजह से चर्चा में रहे हैं. कहीं कपड़ों के ऊपर से किए गए यौन स्पर्श को लेकर कानूनी व्याख्या सामने आई, तो कहीं रेप की तैयारी और प्रयास के बीच अंतर को लेकर सवाल उठे.
इन मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों की सुनवाई के दौरान कानून की व्याख्या के साथ-साथ न्यायिक संवेदनशीलता भी बेहद जरूरी है. आइए ऐसे ही पांच चर्चित मामलों को समझते हैं.
झारखंड हाई कोर्ट के एक मामले में आरोपी पर रात के समय महिला के घर में घुसने, उसे पकड़ने और उसके कपड़े उठाने जैसे आरोप लगाए गए थे. अदालत ने माना कि केवल किसी महिला के घर में घुसना, उसे पकड़ना या उसके कपड़े उठाना अपने आप में रेप के प्रयास को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
अदालत ने कहा कि रेप के प्रयास का आरोप साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने अपराध को पूरा करने की दिशा में कोई ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाया था, जिससे उसकी मंशा स्पष्ट हो. इस टिप्पणी के बाद यह बहस तेज हुई कि यौन अपराधों में आरोपी के आचरण और उसकी मंशा का आकलन किस तरह किया जाना चाहिए.
पटना हाई कोर्ट और सलवार खोलने की कोशिश
बिहार से जुड़े एक मामले में आरोपी पर महिला के साथ जबरदस्ती करने, उसके सीने पर दबाव डालने और सलवार खोलने की कोशिश करने के आरोप थे. मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह जांचा कि आरोपी के कदम रेप के प्रयास की कानूनी कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं.
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर अपराध को महिला की मर्यादा भंग करने से संबंधित प्रावधान के तहत देखा. इस मामले ने यह सवाल खड़ा किया कि किसी आरोपी की यौन हरकत को रेप के प्रयास की श्रेणी में रखने के लिए किन परिस्थितियों और सबूतों की जरूरत होती है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट का ‘पायजामा की डोरी’ वाला मामला
इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक मामले में नाबालिग लड़की के साथ कथित यौन हरकत और उसके कपड़े नीचे करने की कोशिश का मामला सामने आया था. हाई कोर्ट ने आरोपी के कृत्य को रेप के प्रयास के बजाय उसकी तैयारी माना था.
बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की इस व्याख्या को पलट दिया. शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर आरोपी की मंशा अपराध करने की थी और उसने उस दिशा में ठोस कदम उठा दिया था, लेकिन किसी बाहरी वजह से अपराध पूरा नहीं हो सका, तो उसे केवल तैयारी नहीं माना जा सकता.
इस फैसले ने रेप की ‘तैयारी’ और ‘प्रयास’ के बीच कानूनी अंतर को एक बार फिर चर्चा में ला दिया.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट और पेनिट्रेशन का सवाल
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक मामले में रेप और रेप के प्रयास के बीच अंतर को लेकर फैसला सामने आया. मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूर्ण दुष्कर्म साबित नहीं माना और अपराध को रेप के प्रयास की श्रेणी में रखा.
फैसले के बाद इस बात को लेकर चर्चा हुई कि यौन अपराध में पेनिट्रेशन नहीं होने की स्थिति में अपराध की कानूनी श्रेणी कैसे तय की जाए. ऐसे मामलों में अदालत को घटनाक्रम, आरोपी की मंशा, उसके उठाए गए कदम और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर फैसला करना होता है.
POCSO से जुड़े एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी ने देशभर में बहस छेड़ दी थी. अदालत ने माना था कि बच्चे के संवेदनशील हिस्से को कपड़े के ऊपर से छूना संबंधित प्रावधान के तहत यौन हमला नहीं माना जा सकता, क्योंकि त्वचा से त्वचा का सीधा संपर्क नहीं हुआ था.
यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट की इस संकीर्ण व्याख्या को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा देना है और अपराध की गंभीरता को केवल ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क की शर्त से नहीं जोड़ा जा सकता.
जजों के लिए जारी हुई हैंडबुक
यौन अपराधों की सुनवाई में न्यायिक भाषा और संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी चिंता जता चुका है. इसी दिशा में मद्रास हाई कोर्ट ने यौन अपराधों और संवेदनशील पीड़ितों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले जजों के लिए ‘Judgments and Gender’ नाम की हैंडबुक जारी की है.
इस हैंडबुक में पीड़ितों की सुरक्षा, मुआवजा, कोर्टरूम में व्यवहार और गवाही से जुड़े कई दिशा-निर्देश दिए गए हैं. इसमें जजों को ऐसी भाषा और शब्दों से बचने की सलाह दी गई है, जिससे पीड़ित को ही दोषी ठहराने या उसके प्रति किसी तरह का पूर्वाग्रह दिखाई दे.
हैंडबुक में यौन अपराधों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के 27 फैसलों का भी संदर्भ दिया गया है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया कानून के साथ-साथ पीड़ित की गरिमा और संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखे.
इन मामलों से साफ है कि यौन अपराधों में अदालतों के सामने सिर्फ यह तय करने की चुनौती नहीं होती कि आरोपी ने कौन-सा अपराध किया है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि उसकी मंशा क्या थी, उसने अपराध को अंजाम देने की दिशा में कितने ठोस कदम उठाए और उपलब्ध साक्ष्य क्या कहते हैं. सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या करते समय पीड़ित की गरिमा, अपराध की प्रकृति और न्यायिक संवेदनशीलता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.